Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 991

1875 Mantra
Devata- इन्द्राग्नी Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
इ꣡न्द्रा꣢ग्नी यु꣣वा꣢मि꣣मे꣢३ऽभि꣡ स्तोमा꣢꣯ अनूषत । पि꣡ब꣢तꣳ शम्भुवा सु꣣त꣢म् ॥९९१॥

इ꣡न्द्रा꣢꣯ग्नी । इ꣡न्द्र꣢꣯ । अग्नी꣣इ꣡ति꣢ । यु꣣वा꣢म् । इ꣣मे꣢ । अ꣣भि꣢ । स्तो꣡माः꣢꣯ । अ꣣नूषत । पि꣡ब꣢꣯तम् । श꣣म्भुवा । शम् । भुवा । सुत꣢म् ॥९९१॥

Mantra without Swara
इन्द्राग्नी युवामिमे३ऽभि स्तोमा अनूषत । पिबतꣳ शम्भुवा सुतम् ॥

इन्द्राग्नी । इन्द्र । अग्नीइति । युवाम् । इमे । अभि । स्तोमाः । अनूषत । पिबतम् । शम्भुवा । शम् । भुवा । सुतम् ॥९९१॥

Samveda - Mantra Number : 991
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
जिन प्राणापान को ऊपर मित्रावरुण शब्द से स्मरण किया था वे ही यहाँ 'इन्द्राग्नी' नाम से स्मरण किये गये हैं। इन्द्र बल की देवता है तो अग्नि प्रकाश की । इन्द्र देवता प्रस्तुत मन्त्रों के ऋषि को ‘ भारद्वाज’=शक्ति-सम्पन्न बनाती है तो 'अग्निदेवता' उसे प्रकाश व ज्ञान से युक्त करके 'बार्हस्पत्य' बनाती है। इस प्रकार इसके 'क्षत्र व ब्रह्म' दोनों का ही विकास होता है। इन दोनों तत्त्वों के लिए ही शरीर में सोम का विनियोग होता है। सोम शरीर में बल बढ़ाता है और मस्तिष्क में ज्ञानाग्नि का ईंधन बनता है ।

हे (इन्द्राग्नी) = बल व प्रकाश की देवताओ ! (युवाम्) = तुम दोनों को (इमे स्तोमा:) = ये स्तुतिसमूह (अभ्यनूषत) = प्रशंसित करते हैं । वेदमन्त्रों में क्षेत्र व ब्रह्म की ही प्रशंसा है- बल तथा ज्ञान के सम्पादन पर ही बल दिया गया है। ये दोनों ही मनुष्य को आदर्श मनुष्य बनाते हैं। (शंभुवा) = ये दोनों ही जीवन में शान्ति को जन्म देनेवाले हैं। ये दोनों (सुतम्) = उत्पन्न सोमरस का (पिबतम्) = पान करें। शरीर में उत्पन्न सोम शरीर तथा मस्तिष्क के निर्माण में ही विनियुक्त हो । 
Essence
मैं सोम को शरीर में इस प्रकार खपाऊँ कि बलवान् बनकर 'इन्द्र' बनूँ और प्रकाशमय जीवनवाला बनकर 'अग्नि' बनूँ |
 
Subject
इन्द्राग्नी का सोमपान