Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 990

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- कुरुसुतिः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
वा꣡च꣢म꣣ष्टा꣡प꣢दीम꣣हं꣡ नव꣢꣯स्रक्तिमृता꣣वृ꣡ध꣢म् । इ꣢न्द्रा꣣त्प꣡रि꣢त꣣꣬न्वं꣢꣯ ममे ॥९९०॥

वा꣡च꣢꣯म् । अ꣣ष्टा꣡प꣢दीम् । अ꣣ष्ट꣢ । प꣣दीम् । अह꣢म् । न꣡व꣢꣯स्रक्तिम् । न꣡व꣢꣯ । स्र꣣क्तिम् । ऋतावृ꣡ध꣢म् । ऋ꣣त । वृ꣡ध꣢꣯म् । इ꣡न्द्रा꣢꣯त् । प꣡रि꣢꣯ । त꣢न्वम् । म꣣मे ॥९९०॥

Mantra without Swara
वाचमष्टापदीमहं नवस्रक्तिमृतावृधम् । इन्द्रात्परितन्वं ममे ॥

वाचम् । अष्टापदीम् । अष्ट । पदीम् । अहम् । नवस्रक्तिम् । नव । स्रक्तिम् । ऋतावृधम् । ऋत । वृधम् । इन्द्रात् । परि । तन्वम् । ममे ॥९९०॥

Samveda - Mantra Number : 990
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रस्तुत मन्त्र का ऋषि 'कुरुसुति काण्व' है - कण-कण करके सोम का अपने अन्दर उत्पादन करनेवाला है । यह कहता है कि (अहम्) = मैं (इन्द्रात्) - उस ज्ञानरूप परमैश्वर्यवाले प्रभु से (वाचम्) - वाणी को (परिममे) = अपने अन्दर निर्मित करता हूँ । किस वाणी को -

१. (अष्टापदीम्) = [क] [अष्टापदी दिग्भिः, अवान्तर दिग्भिः च- - यास्क० ११.४०] आठों दिशाओं में, अर्थात् सर्वत्र व्याप्त । सर्वत्र-सब लोक-लोकान्तरों में प्रभु ने इसी वाणी का तो उपदेश दिया है। [ख] अथवा नाम, धातु, अव्यय, उपसर्ग, स्वर, व्यञ्जन, अनुस्वार, विसर्गरूप आठ पदोंवाली—Eight parts of speech वाली । २. (नवस्त्रक्तिम्) = [क] [नू=स्तुतौ] प्रभु-स्तवन का सृजन करनेवाली [सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति ] – सारे वेद उसी प्रभु का तो स्तवन कर रहे हैं। [ख] अथवा नव निधियों का – सब शक्तियों का सृजन करनेवाली । ३. (ऋतावृधम्) = सत्य का वर्धन करनेवाली । ४. (तन्वम्) = सूक्ष्म, अर्थात् जिसमें सब विद्याएँ बीजरूप से निहित हैं ।
Essence
मैं सोम की रक्षा करता हुआ वेदवाणी को अपनानेवाला बनूँ ।
Subject
अष्टापदी वाक्