Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 988

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- कुरुसुतिः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
उ꣣त्ति꣢ष्ठ꣣न्नो꣡ज꣢सा स꣣ह꣢ पी꣣त्वा꣡ शिप्रे꣢꣯ अवेपयः । सो꣡म꣢मिन्द्र च꣣मू꣢ सु꣣त꣢म् ॥९८८॥

उ꣣त्ति꣡ष्ठ꣢न् । उ꣣त् । ति꣡ष्ठ꣢꣯न् । ओ꣡ज꣢꣯सा । स꣣ह꣢ । पी꣣त्वा꣢ । शिप्रे꣢꣯इ꣡ति꣢ । अ꣣वेपयः । सो꣡म꣢꣯म् । इ꣣न्द्र । चमू꣡इति꣢ । सु꣣त꣢म् ॥९८८॥

Mantra without Swara
उत्तिष्ठन्नोजसा सह पीत्वा शिप्रे अवेपयः । सोममिन्द्र चमू सुतम् ॥

उत्तिष्ठन् । उत् । तिष्ठन् । ओजसा । सह । पीत्वा । शिप्रेइति । अवेपयः । सोमम् । इन्द्र । चमूइति । सुतम् ॥९८८॥

Samveda - Mantra Number : 988
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (इन्द्र) = इन्द्रियों के अधिष्ठाता जीव! तू (चमूसुतम्) = द्यावापृथिवी, अर्थात् मस्तिष्क और शरीर के विकास के लिए उत्पन्न किये गये (सोमम्) = सोम को (पीत्वा) = पीकर (ओजसा सह) = शक्ति के साथ (उत्तिष्ठन्) = अपने शत्रुओं के विरोध में उठता हुआ उनके (शिप्रे अवेपय:) = जबड़ों को कम्पित कर देता है – तू उनकी बत्तीसी को बाहर निकाल देता है— उनके दाँतों को तोड़ देता है । मन्त्रार्थ में निम्न बातें स्पष्ट हैं— १. ('सोमपान') = शक्ति की रक्षा जितेन्द्रिय ही कर सकता है

[इन्द्र] । २. यह सोम शरीर तथा मस्तिष्क दोनों के विकास के लिए उत्पन्न किया गया है। रोगकृमियों को कम्पित व नष्ट करके यह वीर्य [वि + ईर] शरीर को नीरोग बनाता है और ज्ञानाग्नि का ईंधन बनकर यह मस्तिष्करूप द्युलोक को जगमगा देता है । ३. सोमपान से ही इन्द्र ओजस्वी बनता है।४. शक्तिशाली बनकर यह शत्रुओं पर आक्रमण करता है और उनको पूर्णतया पराजित कर देता है।
Essence
१. हम इन्द्र बनें, २. सोमपान करके शक्तिशाली बनें, ३. ओजस्वी बनकर शत्रुओं पर आक्रमण करें और उनकी बत्तीसी को तोड़ दें ।
Subject
शत्रु-कम्पन