Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 981

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- जमदग्निर्भार्गवः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
त्व꣡ꣳ सो꣢म꣣ प꣡रि꣢ स्रव꣣ स्वा꣡दि꣢ष्ठो꣣ अ꣡ङ्गि꣢रोभ्यः । व꣣रिवोवि꣢द्घृ꣣तं꣡ पयः꣢꣯ ॥९८१॥

त्वम् । सो꣣म । प꣡रि꣢ । स्र꣣व । स्वा꣡दि꣢꣯ष्ठ । अ꣡ङ्गि꣢꣯रोभ्यः । व꣣रिवोवि꣢त् । व꣣रिवः । वि꣢त् । घृ꣣त꣢म् । प꣡यः꣢꣯ ॥९८१॥

Mantra without Swara
त्वꣳ सोम परि स्रव स्वादिष्ठो अङ्गिरोभ्यः । वरिवोविद्घृतं पयः ॥

त्वम् । सोम । परि । स्रव । स्वादिष्ठ । अङ्गिरोभ्यः । वरिवोवित् । वरिवः । वित् । घृतम् । पयः ॥९८१॥

Samveda - Mantra Number : 981
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (वरिवोवित्) = सब उत्तम धनों को प्राप्त करानेवाले ! (सोम) = सब ऐश्वर्यों को जन्म देनेवाले प्रभो! आप (अङ्गिरोभ्यः) = प्राणविद्या के साधकों के लिए (स्वादिष्ठः) = अत्यन्त रसमय हैं । ('रसो वै सः’) =, ‘रस’ तो प्रभु ही हैं, परन्तु उस 'रस' का अनुभव 'प्राणविद्या' के साधक ही कर पाते हैं। आप हमें (घृतम्) = नैर्मल्य व दीप्ति तथा (पयः) = आप्यायन-वृद्धि को (परिस्रव) = प्राप्त कराएँ ।

प्राणसाधना के मार्ग को अपनाने पर साधक को चित्तवृत्ति की एकाग्रता के अनुपात में उस रसमय प्रभु के रस का अनुभव होने लगता है। हमारे जीवनों में एक दिन वह आता है, जब हमारे लिए प्रभु-चिन्तन ही स्वादिष्ट व मधुरतम हो जाता है । वे प्रभु ही हमें ‘नैर्मल्य, दीप्ति व आप्यायन' प्राप्त कराते हैं ।
Essence
हम प्राणसाधनावाले अङ्गिरा बनें और प्रभु-भक्ति के रस का पान करें।
Subject
भक्ति-रस-पान