Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 980

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- जमदग्निर्भार्गवः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
सो꣢ अ꣣र्षे꣡न्द्रा꣢य पी꣣त꣡ये꣢ ति꣣रो꣡ वारा꣢꣯ण्य꣣व्य꣡या꣢ । सी꣡द꣢न्नृ꣣त꣢स्य꣣ यो꣢नि꣣मा꣢ ॥९८०॥

सः꣢ । अ꣣र्ष । इ꣡न्द्रा꣢꣯य । पी꣣त꣡ये꣢ । ति꣣रः꣢ । वा꣡रा꣢꣯णि । अ꣣व्य꣡या꣢ । सी꣡द꣢꣯न् । ऋ꣣त꣡स्य꣢ । यो꣡नि꣢꣯म् । आ ॥९८०॥

Mantra without Swara
सो अर्षेन्द्राय पीतये तिरो वाराण्यव्यया । सीदन्नृतस्य योनिमा ॥

सः । अर्ष । इन्द्राय । पीतये । तिरः । वाराणि । अव्यया । सीदन् । ऋतस्य । योनिम् । आ ॥९८०॥

Samveda - Mantra Number : 980
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रस्तुत मन्त्र का ऋषि ‘जमदग्नि भार्गव' है, जिसने आचार्यकुल में रहकर वेदवाणी का अध्ययन करते हुए नियमित आहार-विहार से जाठराग्नि को ठीक रख 'जमदग्नि' बनकर स्वास्थ्य को स्थिर रक्खा है और ज्ञान द्वारा अपना ठीक परिपाक कर' भार्गव' नाम को चरितार्थ किया है । इस जमदग्नि से प्रभु कहते हैं कि — १. (सः) = वह तू (इन्द्राय अर्ष) = इन्द्र बनने के लिए गतिशील हो, तेरा प्रयत्न जितेन्द्रिय बनने के लिए हो । २. (पीतये) = अपनी रक्षा के लिए शरीर में उत्पन्न किये गये सोम का पान करनेवाला बन [पा पाने, पा रक्षणे] । ३. (अव्यया) = रक्षण में उत्तम इस वेदवाणी के द्वारा तू वाराणि - ज्ञान की आवरणभूत वासनाओं को [वाराणि = वृत्राणि] (तिरः) = पार कर जा । ४. (ऋतस्य) = ऋत के, सत्य वेदज्ञान के (योनिम्) = मूलस्थान प्रभु में (आसीदन्) = बैठने के हेतु से (अर्ष) = गतिमय हो । तेरी सारी क्रियाएँ इसलिए हों कि तू अन्ततः ऋत के स्रोत तक पहुँच सके - ऋत के मूलस्थान प्रभु में स्थित हो सके। 
Essence
हम जितेन्द्रिय बनें, सोमपान करें, वासनाओं को तरें और अन्त में ऋत के मूलस्थान प्रभु में पहुँच जाएँ। 
Subject
ऋत के मूलस्थान में