Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 978

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- अवत्सारः काश्यपः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
यो꣢ जि꣣ना꣢ति꣣ न꣡ जीय꣢꣯ते꣣ ह꣢न्ति꣣ श꣡त्रु꣢म꣣भी꣡त्य꣢ । स꣡ प꣢वस्व सहस्रजित् ॥९७८॥

यः꣢ । जि꣣ना꣡ति꣢ । न । जी꣡य꣢꣯ते । ह꣡न्ति꣢꣯ । श꣡त्रु꣢꣯म् । अ꣣भी꣡त्य꣢ । अ꣣भि । इ꣡त्य꣢꣯ । सः । पव꣣स्व । सहस्रजित् । सहस्र । जित् ॥९७८॥

Mantra without Swara
यो जिनाति न जीयते हन्ति शत्रुमभीत्य । स पवस्व सहस्रजित् ॥

यः । जिनाति । न । जीयते । हन्ति । शत्रुम् । अभीत्य । अभि । इत्य । सः । पवस्व । सहस्रजित् । सहस्र । जित् ॥९७८॥

Samveda - Mantra Number : 978
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(यः) = जो (जिनाति) = नष्ट करता है, परन्तु (न जीयते) = कभी नष्ट किया नहीं जाता । जो (शत्रुम् अभि इत्य) = शत्रु की ओर जाकर हन्ति उसका संहार करता है, (सः) = वह (सहस्रजित्) = [सर्वजित्] = सबको जीतनेवाला प्रभु (पवस्व) = हमें प्राप्त हो ।

प्रभु रुद्ररूपेण सारे संसार का प्रलय करते हैं, प्रभु का प्रलय नहीं होता। प्रभु के सामने आकर काम भस्म हो जाता है। उस प्रभु की कृपा से भक्त भी काम पर विजय पाता है। इस प्रकार सभी के विजेता ये प्रभु मुझे प्राप्त हों ।
Essence
प्रभु-भक्त भी प्रभु की भाँति वासनाओं का संहार करनेवाला बनता है, वह वासनाओं से पराजित नहीं होता ।
Subject
विजेता न कि विजित