Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 973

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- असितः काश्यपो देवलो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
स꣡ वह्नि꣢꣯र꣣प्सु꣢ दु꣣ष्ट꣡रो꣢ मृ꣣ज्य꣡मा꣢नो꣣ ग꣡भ꣢स्त्योः । सो꣡म꣢श्च꣣मू꣡षु꣢ सीदति ॥९७३॥

सः꣢ । व꣡ह्निः꣢꣯ । अ꣣प्सु꣢ । दु꣣ष्ट꣡रः꣢ । दुः꣣ । त꣡रः꣢꣯ । मृ꣣ज्य꣡मा꣢नः । ग꣡भ꣢꣯स्त्योः । सो꣡मः꣢꣯ । च꣣मू꣡षु꣢ । सी꣣दति ॥९७३॥

Mantra without Swara
स वह्निरप्सु दुष्टरो मृज्यमानो गभस्त्योः । सोमश्चमूषु सीदति ॥

सः । वह्निः । अप्सु । दुष्टरः । दुः । तरः । मृज्यमानः । गभस्त्योः । सोमः । चमूषु । सीदति ॥९७३॥

Samveda - Mantra Number : 973
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (सः) = वे प्रभु (वह्निः) = प्रजाओं को सत्पथ पर ले चलकर मोक्ष तक ले जानेवाले हैं । २. (अप्सु) = प्रजाओं में स्थित वे प्रभु (दुष्टर:) = कामादि वासनाओं से आक्रमण के योग्य नहीं है। प्रभु हृदय-स्थित होते हैं तो हमारे हृदय वासनाओं से आक्रान्त नहीं होते । ३. (गभस्त्योः) = ज्ञान के सूर्य तथा विज्ञान के चन्द्र के प्रकाश की किरणों में (मृज्यमानः) = वे प्रभु ढूँढे जाते हैं । उस प्रभु को जानने का उपाय ज्ञान-विज्ञान की वृद्धि ही है। ४. वे (सोमः) = शान्तामृत प्रभु (चमूषु) = चमुओं में (सीदति) = स्थित होते हैं।‘सत्य, यश व श्री' का आचमन करनेवाले ‘चमू' हैं। प्रभु इन चमुओं में ही स्थित होते हैं । हम अपने जीवन को सत्यमय बनाएँ।
Essence
हम सत्य, यश व श्री का आचमन करें, जिससे प्रभु हममें स्थित हों ।
Subject
चमू-षत्