Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 971

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- असितः काश्यपो देवलो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ꣣꣬भ्य꣢꣯र्ष बृ꣣ह꣡द्यशो꣢꣯ म꣣घ꣡व꣢द्भ्यो ध्रु꣣व꣢ꣳ र꣣यि꣢म् । इ꣡ष꣢ꣳ स्तो꣣तृ꣢भ्य꣣ आ꣡ भ꣢र ॥९७१॥

अभि꣢ । अ꣣र्ष । बृह꣢त् । य꣡शः꣢꣯ । म꣣घ꣢व꣢द्भ्यः । ध्रु꣣व꣢म् । र꣣यि꣢म् । इ꣡ष꣢꣯म् । स्तो꣣तृ꣡भ्यः꣢ । आ । भ꣣र ॥९७१॥

Mantra without Swara
अभ्यर्ष बृहद्यशो मघवद्भ्यो ध्रुवꣳ रयिम् । इषꣳ स्तोतृभ्य आ भर ॥

अभि । अर्ष । बृहत् । यशः । मघवद्भ्यः । ध्रुवम् । रयिम् । इषम् । स्तोतृभ्यः । आ । भर ॥९७१॥

Samveda - Mantra Number : 971
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
हे प्रभो! आप (मघवद्भ्यः) = [मघ=मख] यज्ञमय जीवनवाले अपने स्(तोतृभ्यः) =स्तोताओं के लिए १. (बृहत् यशः) = [बृहि वृद्धौ] वृद्धि के कारणभूत यश को (अभ्यर्ष) = प्राप्त कराइए। अपयश मनुष्य को निराश व हताश कर देता है, अतियश कुछ अभिमान की ओर ले जाता है और मर्यादित यश उत्साह द्वारा वृद्धि का कारण बनता है। २. (ध्रुवं रयिम्) = स्थैर्यवाले धन को प्राप्त कराइए । निर्धनता मनुष्य को नाश व पाप की ओर ले जाती है, अतिधन 'अहंकार व विषयों' की ओर । मर्यादित धन मनुष्य को धर्म के मार्ग में ध्रुव [स्थिर] करता है, यही ‘ध्रुव रयि'=स्थिर धन है। ३. हे प्रभो ! हमें सदा (इषम्) = प्रेरणा व उत्तम इच्छा (आभर) = प्राप्त कराइए । हम प्रभु का स्तवन करें । वे प्रभु हमें सदा अन्तःप्रकाश प्राप्त कराएँ जिससे उस प्रकाश में हम सदा उत्तम इच्छाओंवाले बनें।
Essence
हम यज्ञशील बनकर प्रभु का सच्चा स्तवन करें। वे प्रभु हमें वृद्धि के कारणभूत 'यश, स्थिर धन व उत्तम प्रेरणा' प्राप्त कराएँ । 
 
Subject
बृहद्यश, ध्रुवरयि व इष