Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 970

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- असितः काश्यपो देवलो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
प꣢रि꣣ वि꣡श्वा꣢नि꣣ चे꣡त꣢सा मृ꣣ज्य꣢से꣣ प꣡व꣢से म꣣ती꣡ । स꣡ नः꣢ सोम꣣ श्र꣡वो꣢ विदः ॥९७०॥

प꣡रि꣢꣯ । वि꣡श्वा꣢꣯नि । चे꣡त꣢꣯सा । मृ꣣ज्य꣡से꣢ । प꣡व꣢꣯से । म꣣ती꣢ । सः । नः꣣ । सोम । श्र꣡वः꣢꣯ । वि꣣दः ॥९७०॥

Mantra without Swara
परि विश्वानि चेतसा मृज्यसे पवसे मती । स नः सोम श्रवो विदः ॥

परि । विश्वानि । चेतसा । मृज्यसे । पवसे । मती । सः । नः । सोम । श्रवः । विदः ॥९७०॥

Samveda - Mantra Number : 970
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. हे (सोम) = शान्तामृतस्वरूप प्रभो ! आप (विश्वानि) = सब भूतों को (चेतसा) = संज्ञान के द्वारा (परिमृज्यसे) = सर्वतः पवित्र कर देते हो । ज्ञान ही पवित्र करने का साधन है, अतः प्रभु संज्ञान के द्वारा सबकी पवित्रता को सिद्ध करते हैं । २. (मती) [मत्या] = बुद्धि के द्वारा आप सबको (पवसे) = पवित्र करते हो । बुद्धि से मनुष्य सत्यासत्य में, धर्माधर्म में तथा कर्त्तव्याकर्त्तव्य में विवेक कर पाता है। विवेक द्वारा असत्य, अधर्म व अकर्त्तव्य से दूर होकर तथा सत्य, धर्म व कर्त्तव्य को अपनाकर मनुष्य अपने जीवन को पवित्र कर पाता है । ३. (सः) = वह प्रभु (नः) = हमें (श्रवः) = ज्ञान व यश (विदः) = प्राप्त कराए। ज्ञान के द्वारा प्रशंसनीय कर्मों को करते हुए हम यशस्वी जीवनवाले हों । 
Essence
‘ज्ञान, प्रशंसनीय कर्म व यश' यह हमारे जीवन का क्रम हो ।
Subject
ज्ञान, प्रशंसनीय कर्म, यश