Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 966

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- असितः काश्यपो देवलो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
प꣡व꣢स्व वृत्र꣣ह꣡न्त꣢म उ꣣क्थे꣡भि꣢रनु꣣मा꣡द्यः꣢ । शु꣡चिः꣢ पाव꣣को꣡ अद्भु꣢꣯तः ॥९६६॥

प꣡व꣢꣯स्व । वृ꣣त्र꣡हन्त꣢मः । वृ꣣त्र । ह꣡न्त꣢꣯मः । उ꣣क्थे꣡भिः꣢ । अ꣣नुमा꣡द्यः꣢ । अ꣣नु । मा꣡द्यः꣢꣯ । शु꣡चिः꣢꣯ । पा꣣व꣢कः । अ꣡द्भु꣢꣯तः । अत् । भुतः ॥९६६॥

Mantra without Swara
पवस्व वृत्रहन्तम उक्थेभिरनुमाद्यः । शुचिः पावको अद्भुतः ॥

पवस्व । वृत्रहन्तमः । वृत्र । हन्तमः । उक्थेभिः । अनुमाद्यः । अनु । माद्यः । शुचिः । पावकः । अद्भुतः । अत् । भुतः ॥९६६॥

Samveda - Mantra Number : 966
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रभु एक प्रचारक [परिव्राजक] के लिए आदेश देते हैं कि तू १. (वृत्रहन्तम:) = ज्ञान की आवरणभूत वासना को सर्वाधिक विनष्ट करनेवाला बन । काम को पराजित करके ही तू लोगों को कामविजय का उपदेश दे सकेगा । २. (उक्थेभिः) = स्तोत्रों के द्वारा पवस्व-तू अपने जीवन को पवित्र कर । वासना का पराजय प्रभु-स्मरण से ही होगा। प्रभु के बिना काम का ध्वंस कौन करेगा ? ३. (अनुमाद्यः) = तेरा जीवन ऐसा हो कि लोग तेरे जीवन को देखकर सदा प्रशंसात्मक शब्द ही बोलें । ४. (शुचिः) = तू पवित्र जीवनवाला हो – शुभ गुण तेरे जीवन को दीप्त बनाएँ, ५. (पावकः) = तू अपने सम्पर्क से, प्रेरणा से औरों के जीवन को भी पवित्र बनानेवाला हो । ६. (अद्भुत:) = तेरा जीवन कुछ विलक्षणता व विशेषता को लिये हुए हो [अभूतपूर्व:]। अन्यों जैसा-प्राकृत जीवन होने पर तू औरों पर क्या प्रभाव डाल पाएगा? विशेषतावाला जीवन ही औरों के लिए आदर्श हो सकता है।
Essence
प्रचारक को वासनाओं से ऊपर, स्तोत्रों से सदा अपने को पवित्र करनेवाला, प्रशंसनीय, पवित्र, पावन व विशिष्ट जीवनवाला होना चाहिए ।
Subject
विशिष्ट जीवन