Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 964

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- असितः काश्यपो देवलो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
इ꣢न्दो꣣ य꣡दद्रि꣢꣯भिः सु꣣तः꣢ प꣣वि꣡त्रं꣢ परि꣣दी꣡य꣢से । अ꣢र꣣मि꣡न्द्र꣢स्य꣣ धा꣡म्ने꣢ ॥९६४॥

इ꣡न्दो꣢꣯ । यत् । अ꣡द्रि꣢꣯भिः । अ । द्रि꣣भिः । सुतः꣢ । प꣣वि꣡त्र꣢म् । प꣣रिदी꣡य꣢से । प꣣रि । दी꣡य꣢꣯से । अ꣡र꣢꣯म् । इ꣡न्द्र꣢꣯स्य । धा꣡म्ने꣢꣯ ॥९६४॥

Mantra without Swara
इन्दो यदद्रिभिः सुतः पवित्रं परिदीयसे । अरमिन्द्रस्य धाम्ने ॥

इन्दो । यत् । अद्रिभिः । अ । द्रिभिः । सुतः । पवित्रम् । परिदीयसे । परि । दीयसे । अरम् । इन्द्रस्य । धाम्ने ॥९६४॥

Samveda - Mantra Number : 964
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (इन्दो) = सोम के संयम के द्वारा शक्ति के पुञ्ज इन्दो ! १. (यत्) = जब तू (अद्रिभिः) = आदरणीय अथवा [अविदरणीय] स्थिर, अविचल बुद्धिवाले आचार्यों से (सुतः) = उत्पादित हुआ-हुआ—'द्विज' बनकर २. (पवित्रम्) = उस पूर्ण पवित्र प्रभु को (परिदीयसे) = जाता है – उस प्रभु की ओर चलने का प्रयत्न करता है तब ३. (इन्द्रस्य) = उस परमैश्वर्यशाली प्रभु के (धाम्ने) = तेज व स्थान को प्राप्त करने के लिए (अरम्) = समर्थ होता है । 

आचार्य-कुलों में आचार्यों के सम्पर्क में रहकर मनुष्य अपने ज्ञान को बढ़ाकर 'द्विज' बनता है। वैदिक संस्कृति के अनुसार आचार्य विद्यार्थी को गर्भ में धारण करता है और उसे ज्ञानोपचित करके दुबारा जन्म देता है । इस द्विजत्व को प्राप्त करके वह प्रभु के तेज को प्राप्त कर लेता है। 
Essence
हम आचार्य से द्विज बनाये जाकर प्रभु तेज को धारण करें ।
Subject
प्रभु का धाम