Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 963

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- असितः काश्यपो देवलो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
प्र꣡ प꣢वमान धन्वसि꣣ सो꣡मेन्द्रा꣢꣯य꣣ मा꣡द꣢नः । नृ꣡भि꣢र्य꣣तो꣡ वि नी꣢꣯यसे ॥९६३॥

प्र꣢ । प꣣वमान । धन्वसि । सो꣡म꣢꣯ । इ꣡न्द्रा꣢꣯य । मा꣡द꣢꣯नः । नृ꣡भिः꣢꣯ । य꣣तः꣢ । वि । नी꣣यसे ॥९६३॥

Mantra without Swara
प्र पवमान धन्वसि सोमेन्द्राय मादनः । नृभिर्यतो वि नीयसे ॥

प्र । पवमान । धन्वसि । सोम । इन्द्राय । मादनः । नृभिः । यतः । वि । नीयसे ॥९६३॥

Samveda - Mantra Number : 963
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(पवमान) = अपने जीवन को पवित्र करनेवाले ! २. (सोम) = सौम्य स्वभाववाले ! तू ३. (इन्द्राय) = उस परमैश्वर्यशाली प्रभु की (प्रधन्वसि) = ओर जाता है। प्रभु-प्राप्ति के लिए 'पवित्रता व सौम्यता' का मिश्रण आवश्यक है । ४. (मादन:)= [हर्षण:] ऐसा व्यक्ति सदा स्वयं प्रसन्न होता है तथा औरों को प्रसन्न करता है ।

'यह ऐसा बन कैसे पाया ?' इसका उत्तर है कि (यतः) = क्योंकि यह (नृभिः) = [नृ नये] उन्नतिपथ पर आगे और आगे ले-चलनेवाले माता-पिता-आचार्य व अतिथियों से (विनीयते) = विनीत बनाया जाता है। जिस भी व्यक्ति को उत्तम माता-पिता व आचार्य प्राप्त होते हैं, वही ज्ञानी बनता है ।
Essence
माता-पिता व आचार्यों से विनीत बनाये जाकर हम प्रभु को प्राप्त करें ।
Subject
प्रभु की ओर