Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 960

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- कश्यपो मारीचः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ज꣣ज्ञानो꣡ वाच꣢꣯मिष्यसि꣣ प꣡व꣢मान꣣ वि꣡ध꣢र्मणि । क्र꣡न्दन् दे꣣वो꣡ न सूर्यः꣢꣯ ॥९६०॥

जज्ञानः꣢ । वा꣡च꣢꣯म् । इ꣣ष्यसि । प꣡व꣢꣯मान । वि꣡ध꣢꣯र्मणि । वि । ध꣣र्मणि । क्र꣡न्द꣢꣯न् । दे꣣वः꣢ । न । सू꣡र्यः꣢꣯ ॥९६०॥

Mantra without Swara
जज्ञानो वाचमिष्यसि पवमान विधर्मणि । क्रन्दन् देवो न सूर्यः ॥

जज्ञानः । वाचम् । इष्यसि । पवमान । विधर्मणि । वि । धर्मणि । क्रन्दन् । देवः । न । सूर्यः ॥९६०॥

Samveda - Mantra Number : 960
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(जज्ञान: सूर्यः देवः न) = उदित होते हुए सूर्यदेव के समान, हृदय में प्रकट होते हुए हे (पवमान) = पवित्र करनेवाले प्रभो! आप (विधर्मणि) = विविध धारणों के निमित्त – सब प्रकार से पालनपोषण करने अथवा विविध धर्मों का ज्ञान देने के लिए (क्रन्दन्)- शब्दों का उच्चारण करते हुए (वाचम्) = इस वेदवाणी को इष्यसि हममें प्रेरित करते हैं । वेदवाणी का उच्चारण करते हुए वे प्रभु हमें हमारे कर्त्तव्य कर्मों की प्रेरणा प्राप्त कराते हैं, जिससे हम उचित प्रकार से अपना धारण कर सकें । 
Essence
जैसे प्रातःकाल होते ही उदित होता हुआ सूर्य प्रकाश फैलाता है, इसी प्रकार परमात्मा सृष्ट्यारम्भ करते ही ऋषियों के पवित्र अन्त:करण में वेदवाणी को प्रेरित करते हैं ।
Subject
सृष्ट्यारम्भ में