Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 959

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- कश्यपो मारीचः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
के꣣तुं꣢ कृ꣣ण्व꣢न् दि꣣व꣢꣫स्परि꣣ वि꣡श्वा꣢ रू꣣पा꣡भ्य꣢र्षसि । स꣣मुद्रः꣡ सो꣢म पिन्वसे ॥९५९॥

के꣣तु꣢म् । कृ꣣ण्व꣢न् । दि꣣वः꣢ । प꣡रि꣢꣯ । वि꣡श्वा꣢꣯ । रु꣣पा꣢ । अ꣣भि꣢ । अ꣣र्षसि । समुद्रः꣢ । स꣣म् । उद्रः꣢ । सो꣣म । पिन्वसे ॥९५९॥

Mantra without Swara
केतुं कृण्वन् दिवस्परि विश्वा रूपाभ्यर्षसि । समुद्रः सोम पिन्वसे ॥

केतुम् । कृण्वन् । दिवः । परि । विश्वा । रुपा । अभि । अर्षसि । समुद्रः । सम् । उद्रः । सोम । पिन्वसे ॥९५९॥

Samveda - Mantra Number : 959
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (सोम) = शान्तामृतस्वरूप प्रभो ! आप (समुद्रः) - ज्ञान के समुद्र हैं, अतएव [स+मुद्] (आनन्दमय) = हैं । आप (दिवः परि) =  इस अनन्त आकाश में चारों ओर (केतुं कृण्वन्)- ज्ञान का प्रकाश करते हुए विश्वा (रूपा) = सब प्राणियों को अभ्यर्षसि प्राप्त होते हैं। प्रभु ने पशुओं में भी वासना [Instinct] के रूप में प्रकाश रक्खा है। मनुष्य को तो बुद्धि दी ही है । हे सोम! आप इस ज्ञान को प्राप्त कराते हुए (पिन्वसे) = सभी का पोषण करते हो । 
Essence
प्रभु ज्ञान देते हैं और उस ज्ञान के द्वारा हमारा पोषण करते हैं ।
 
Subject
ज्ञान के द्वारा पोषण