Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 95

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- पायुर्भारद्वाजः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
प्र꣡त्य꣢ग्ने꣣ ह꣡र꣢सा꣣ ह꣡रः꣢ शृणा꣣हि꣢ वि꣣श्व꣢त꣣स्प꣡रि꣢ । या꣣तुधा꣡न꣢स्य र꣣क्ष꣢सो꣣ ब꣢लं꣣꣬ न्यु꣢꣯ब्ज वी꣣꣬र्यम्꣢꣯ ॥९५॥

प्र꣡ति꣢꣯ । अ꣣ग्ने । ह꣡र꣢꣯सा । ह꣡रः꣢꣯ । शृ꣣णाहि꣢ । वि꣣श्व꣡तः꣢ । प꣡रि꣢꣯ । या꣣तुधा꣡न꣢स्य । या꣣तु । धा꣡न꣢꣯स्य । र꣣क्ष꣡सः꣢ । ब꣡ल꣢꣯म् । नि । उ꣣ब्ज । वी꣣र्य꣢꣯म् ॥९५॥

Mantra without Swara
प्रत्यग्ने हरसा हरः शृणाहि विश्वतस्परि । यातुधानस्य रक्षसो बलं न्युब्ज वीर्यम् ॥

प्रति । अग्ने । हरसा । हरः । शृणाहि । विश्वतः । परि । यातुधानस्य । यातु । धानस्य । रक्षसः । बलम् । नि । उब्ज । वीर्यम् ॥९५॥

Samveda - Mantra Number : 95
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 10;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(अग्ने)=मुझे उन्नत अवस्था में प्राप्त करानेवाले प्रभो! (हरसा) [हरस:] =मेरा हरण करनेवाले, मुझे अपने-आपे में न रहने देनेवाले क्रोध नामक असुर के (हरः) = क्रोध को (विश्वत: परि)=सब ओर से, सब प्रकार (प्रतिशृणाहि)=नष्ट कर दीजिए। मैं क्रोध को अपने से दूर रख सकूँ । इन्द्रियाँ, मन व बुद्धि में कहीं भी इसका निवास न हो। इसके प्रबल होते ही मेरा सारा शरीर काँपने लगता है और मैं स्वस्थ नहीं रहता। मुझे एक सम्मोह-सा हो जाता है और मैं सुध-बुध भूल जाता हूँ। संक्षेप में, यह मुझे हर ले जाता है और इस प्रकार 'हरस' इस सार्थक नामवाला होता है ।

हे प्रभो! आप मेरे इस क्रोध को तो दूर कीजिए ही और (यातु - धानस्य) = [यातु- पीड़ा ] पीड़ा का आधान करनेवाले काम नामक असुर के (बलम्) - बल को भी (न्युब्ज) - झुका दीजिए | (काम) = इच्छा पूर्ण नहीं होती और पूर्ण न होती हुई मनुष्य को पीड़ित करती है। पूर्ण होकर भी वासना मनुष्य को जीर्ण करके दुःखी बना डालती है। इसी से काम को यहाँ यातुधान= पीड़ा देनेवाला कहा गया है। इसका बल व वेग कम होगा तभी हमारा कल्याण होगा।

हे प्रभो! इस यातुधान को दूर करने के साथ ही (रक्षसः) = [र+क्ष] अपने रमण [मौज] के लिए औरों के क्षय की वृत्ति - लोभ की (वीर्यम्)=शक्ति को भी (न्युब्ज) कुचल दो। काम, क्रोध व लोभ मनुष्य की दुर्गति का कारण बनते हैं - सुगति का नहीं । इनकी समाप्ति करके ही मनुष्य अपनी रक्षा कर सकता है और इस मन्त्र का ऋषि ‘पायुः’=अपनी रक्षा करनेवाला बनता है। इनके समाप्त करने पर ही उसकी शक्ति में भी वृद्धि होगी और वह अपने में शक्ति भरनेवाला 'भरद्वाज' कहलाएगा [ वाज= शक्ति ] |
Essence
काम, क्रोध तथा लोभ को समाप्त कर हम अपनी रक्षा करें और शक्तिशाली बनें।
Subject
तीन असुरों का संहार