Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 948

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- प्रयोगो भार्गवः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ꣣यं꣡ विश्वा꣢꣯ अ꣣भि꣢꣫ श्रियो꣣ऽग्नि꣢र्दे꣣वे꣡षु꣢ पत्यते । आ꣢꣫ वाजै꣣रु꣡प꣢ नो गमत् ॥९४८॥

अ꣣य꣢म् । वि꣡श्वाः꣢꣯ । अ꣣भि꣢ । श्रि꣡यः꣢꣯ । अ꣣ग्निः꣢ । दे꣣वे꣡षु꣢ । प꣣त्यते । आ꣢ । वा꣡जैः꣢꣯ । उ꣡प꣢꣯ । नः । गमत् ॥९४८॥

Mantra without Swara
अयं विश्वा अभि श्रियोऽग्निर्देवेषु पत्यते । आ वाजैरुप नो गमत् ॥

अयम् । विश्वाः । अभि । श्रियः । अग्निः । देवेषु । पत्यते । आ । वाजैः । उप । नः । गमत् ॥९४८॥

Samveda - Mantra Number : 948
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 6;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (अयम् अग्निः) = यह सब देवताओं का अग्रणी प्रभु ही (देवेषु) = देवताओं में जो (श्रियः) = श्री हैं (विश्वा:) = उन सबका (अभिपत्यते) = ईश है [पत् ऐश्वर्यकर्मा – नि० २.२१.२] । सूर्य, चन्द्र, अग्नि में जो तेज है, वह सब उस प्रभु की ही तो विभूति है। जलों में वे प्रभु रस हैं, तो वायु में वे प्राण हैं। पृथिवी में सब ओषधियों के उत्पादन की शक्ति भी तो उस प्रभु की ही है। बुद्धिमानों की बुद्धि प्रभु हैं – बलवानों का बल व तेजस्वियों का तेज वे प्रभु ही हैं ।

२. वे प्रभु (नः) = हमारे (उप) = समीप भी (वाजैः) = नाना प्रकार की शक्तियों से (आगमत्) = प्राप्त होते हैं। अन्नमयकोश में तेज, प्राणमयकोश में वीर्य, मनोमयकोश में ओज व बल, विज्ञानमयकोश में मन्यु तथा आनन्दमयकोश में सहस् को प्राप्त करानेवाले वे प्रभु ही हैं । इस प्रकार प्रभुकृपा से ही हम प्रत्येक कोश के वाज व ऐश्वर्य को प्राप्त करके ‘आभूति' बनते हैं। प्रभु से मेल मुझे सब कोशों की विभूति प्राप्त कराता है, अतः प्रभु से मेल करनेवाला 'प्रयोग' [उत्कृष्ट सम्पर्कवाला] ही इस मन्त्र का ऋषि है—यह भार्गव - अपना पूर्ण परिपाक करनेवाला तो है ही।
Essence
श्रीमात्र को प्रभु का अंश जान मुझे अपने वाजों की श्री का गर्व न हो - यह सब तो उस प्रभु की ही देन है । श्रीपति तो पुरुषोत्तम प्रभु ही हैं ।
Subject
श्री-पति पुरुषोत्तम