Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 945

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- प्रतर्दनो दैवोदासिः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
प्रा꣡वी꣢विपद्वा꣣च꣢ ऊ꣣र्मिं꣢꣫ न सिन्धु꣣र्गि꣢र꣣ स्तो꣢मा꣣न्प꣡व꣢मानो मनी꣣षाः꣢ । अ꣣न्तः꣡ पश्य꣢꣯न्वृ꣣ज꣢ने꣣मा꣡व꣢रा꣣ण्या꣡ ति꣢ष्ठति वृष꣣भो꣡ गोषु꣢꣯ जा꣡न꣢न् ॥९४५॥

प्र । अ꣣वीविपत् । वाचः꣢ । ऊ꣣र्मि꣢म् । न । सि꣡न्धुः꣢꣯ । गि꣡रः꣢꣯ । स्तो꣡मा꣢꣯न् । प꣡व꣢꣯मानः । म꣣नीषाः꣢ । अ꣣न्त꣡रिति꣢ । प꣡श्य꣢꣯न् । वृ꣣ज꣡ना꣢ । इ꣣मा꣢ । अ꣡वरा꣢꣯णि । आ । ति꣣ष्ठति । वृषभः꣢ । गो꣡षु꣢꣯ । जा꣣न꣢म् ॥९४५॥

Mantra without Swara
प्रावीविपद्वाच ऊर्मिं न सिन्धुर्गिर स्तोमान्पवमानो मनीषाः । अन्तः पश्यन्वृजनेमावराण्या तिष्ठति वृषभो गोषु जानन् ॥

प्र । अवीविपत् । वाचः । ऊर्मिम् । न । सिन्धुः । गिरः । स्तोमान् । पवमानः । मनीषाः । अन्तरिति । पश्यन् । वृजना । इमा । अवराणि । आ । तिष्ठति । वृषभः । गोषु । जानम् ॥९४५॥

Samveda - Mantra Number : 945
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 6;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
सोम की रक्षा के द्वारा (पवमानः) = अपने जीवन को पवित्र बनाने के स्वभाववाला जैसे (सिन्धुः ऊर्मिं न) = समुद्र अपने में तरंग को प्रेरित करता है, उसी प्रकार १. (वाच:) = [वच व्यक्तायां वाचि] पदार्थों के गुण-धर्मों का स्पष्ट कथन करनेवाले ऋग्वेद अथवा विज्ञानवेद की वाणियों को अपने में (प्रावीविपत्) = प्रकर्षेण प्रेरित करता है। उन वाणियों के द्वारा विज्ञान को बढ़ाकर प्रकृति के पदार्थों का ठीक उपयोग करता है । २. (गिरः) = [गृणाति उपदिशति] यजुर्वेद की उपदेशात्मक गिराओं को भी अपने में खूब प्रेरित करता है और अपने कर्त्तव्यों का सदा स्मरण करता है । ३. (स्तोमान्) = सामवेद की स्तुति-समूहरूप वाणियों को भी सतत प्रेरित करता है और उनके द्वारा यह प्रभु के निकटतम सम्पर्क में आकर शक्तिशाली बनता है । ४. (मनीषा:) = अथर्ववेद की बुद्धिमत्ता से परिपूर्ण नैतिक उपदेश देनेवाली बातों को भी यह अपने में सदा प्रेरित करने का प्रयत्न करता है। वहाँ पहले ही मन्त्र में वह 'कम खाओ, कम बोलो' का पाठ पढ़ता है ।५. (अन्तः पश्यन्) = यह पवमान सदा अन्तः निरीक्षण करनेवाला बनता है और इस आत्मालोचन की प्रवृत्ति के परिणामस्वरूप ही ६. (इमा) = इन (अवराणि) = अवचेतना में छिपकर बैठे हुए [Sub-conscious spirit] (वृजना) = वर्जनीय = निकृष्टभावों को (आतिष्ठति) = पाँवों के नीचे कुचल देता है। परिणामत: ७. (वृषभ:) = शक्तिशाली बनता है और ८. (गोषु) = इन्द्रियों के विषय में (जानन्) = ज्ञानी बनकर चलता है । इन्द्रियों के स्वभाव को समझकर कभी प्रमाद नहीं करता । सदा समझदार बनकर उन्हें अपने वश में रखता है ।
Essence
पापों को कुचलकर मैं सचमुच 'प्रतर्दन' बनूँ ।
Subject
चारों वेदवाणियों की प्रेरणा