Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 942

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- अग्निश्चाक्षुषः Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
अ꣡स꣢र्जि क꣣ल꣡शा꣢ꣳ अ꣣भि꣢ मी꣣ढ्वा꣢꣫न्त्सप्ति꣣र्न꣡ वा꣢ज꣣युः꣢ । पु꣣नानो꣡ वाचं꣢꣯ ज꣣न꣡य꣢न्नसिष्यदत् ॥९४२॥

अ꣡स꣢꣯र्जि । क꣣ल꣡शा꣢न् । अ꣣भि꣢ । मी꣣ढ्वा꣢न् । स꣡प्तिः꣢꣯ । न । वा꣣ज꣢युः । पु꣣नानः꣢ । वा꣡च꣢꣯म् । ज꣣न꣡य꣢न् । अ꣣सिष्यदत् ॥९४२॥

Mantra without Swara
असर्जि कलशाꣳ अभि मीढ्वान्त्सप्तिर्न वाजयुः । पुनानो वाचं जनयन्नसिष्यदत् ॥

असर्जि । कलशान् । अभि । मीढ्वान् । सप्तिः । न । वाजयुः । पुनानः । वाचम् । जनयन् । असिष्यदत् ॥९४२॥

Samveda - Mantra Number : 942
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 6;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
यह सोम (कलशान् अभि) = सोलह कलाओं के आधारभूत शरीरों का लक्ष्य करके (असर्जि) = निर्मित हुआ है। यह शरीर को विफल नहीं होने देता। यह शरीर में होनेवाली कमियों को दूर करके उसे सदा सकल=पूर्ण बनाये रखता है। २. (मीढ्वान्) = इस प्रकार यह सब सुखों की वर्षा करनेवाला है। अङ्ग-प्रत्यङ्ग का, सब इन्द्रियों का ठीक होना ही 'सु-ख' है । ३. (सप्तिः न) = घोड़े के समान (वाजयुः) = शक्ति को यह हमारे साथ जोड़नेवाला है। सोमपान हमें इतनी शक्ति देता है कि हम घोड़े के समान अपने कर्त्तव्य मार्ग का आक्रमण करते हुए कभी थकते नहीं । ४. (पुनान:) = यह हमारे हृदयों में वेदवाणी का आविर्भाव करते हुए (असिष्यदत्) = हमारे शरीर में प्रवाहित होता है। सोमरक्षा से ज्ञानाग्नि दीप्त होती है और हृदय निर्मल, अतः हम प्रभु की वाणी को सुन पाते हैं। ज्ञानवृद्धि करके यह हमें ‘चाक्षुष' बनाता है और हमारी उन्नति का कारण बनकर हमें 'अग्नि' बनाता है ।
Essence
शरीर की न्यूनताओं को दूर करने के लिए ही प्रभु ने सोम की सृष्टि की है।
 
Subject
चाक्षुष अग्नि