Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 94

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- सोमाहुतिर्भार्गवः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
द꣣धन्वे꣢ वा꣣ य꣢दी꣣म꣢नु꣣ वो꣢च꣣द्ब्र꣢꣫ह्मेति꣣ वे꣢रु꣣ त꣢त् । प꣢रि꣣ वि꣡श्वा꣢नि꣣ का꣡व्या꣢ ने꣣मि꣢श्च꣣क्र꣡मि꣢वाभुवत् ॥९४॥

द꣣धन्वे꣢ । वा꣣ । य꣢त् । ई꣣म् । अ꣡नु꣢꣯ । वो꣡च꣢꣯त् । ब्र꣡ह्म꣢꣯ । इ꣡ति꣢꣯ । वेः । उ꣣ । त꣢त् । प꣡रि꣢꣯ । वि꣡श्वा꣢꣯नि꣣ । का꣡व्या꣢꣯ । ने꣣मिः꣢ । च꣣क्र꣢म् इ꣣व । अभुवत् ॥९४॥

Mantra without Swara
दधन्वे वा यदीमनु वोचद्ब्रह्मेति वेरु तत् । परि विश्वानि काव्या नेमिश्चक्रमिवाभुवत् ॥

दधन्वे । वा । यत् । ईम् । अनु । वोचत् । ब्रह्म । इति । वेः । उ । तत् । परि । विश्वानि । काव्या । नेमिः । चक्रम् इव । अभुवत् ॥९४॥

Samveda - Mantra Number : 94
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 10;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(दधन्वे वा)=वे प्रभु निश्चय से धारण करते हैं, (यत् ईम्) = जब जीव उस परमेश्वर को (ब्रह्म इति)=ब्रह्मरूप में (उ) = और (तत् वेः) = 'संसार - जाल का संहार करनेवाले हैं', इस रूप में (अनुवोचत्)=स्मरण करता है। जीव को चाहिए कि प्रतिदिन प्रातः - सायं उस प्रभु को 'ब्रह्म' और 'वे:' इन शब्दों से स्मरण करे | (ब्रह्म) = [बृहि वृद्धौ] वह प्रभु ही महान् है। ('वर्द्धमानं स्वे दमे') = अपने स्वरूप में सदा से बढ़े हुए उस प्रभु का स्मरण करते हुए जीव अहंकारशून्यता को प्राप्त करता है। वह प्रभु 'वे:' हैं, वही तो संसार के सब घटनाचक्र को चला रहे हैं, अतः जो कुछ हो रहा है वह सब ठीक ही है, सब मेरे हित के लिए ही है। यह भावना मनुष्य को कितना सन्तोष प्राप्त कराती है!

वास्तविकता तो यह है कि (इव) = जिस प्रकार (चक्रं परि)= एक पहिए के चारों ओर (नेमिः)=परिधि होती है, उसी के कारण पहिया स्थिर होता है, ठीक इसी प्रकार (विश्वानि)=सब (काव्यानि)=ज्ञानों व आनन्दों के (परि)= चारों ओर वे प्रभु (आभुवत्) हैं। परिधि हटी कि पहिया टूटा। बस, ठीक इसी प्रकार प्रभु हमारे जीवनों से दूर हुए और हमारे सब आनन्द व ज्ञान समाप्त हुए। प्रभु से दूर होने पर प्रेम व शान्ति का स्थान द्वेष तथा संघर्ष ले लेते हैं। मनुष्य बनने के लिए आवश्यक है कि हम उस प्रभु के (ब्रह्म) = महान् रूप को स्मरण करते हुए (सोम) = विनीत बनें और यह समझकर कि 'प्रभु से दूर हुए और वास्तविक आनन्द से भी दूर
हुए' उस प्रभु के प्रति अपना समर्पण करनेवाले 'आहुति' बनें। यह 'सोमाहुति ' ही इस मन्त्र का ऋषि है। यह भृगु - पुत्र है, (भृगु) = परि-पाक करनेवाले का सन्तान है। यदि हम ज्ञान से अपने को परिपक्व बनाएँगे तभी 'सोमाहुति' भी हो पाएँगे
Essence
प्रभु की महिमा व सर्वकर्तृत्व का स्मरण कर हम विनीत व सन्तुष्ट बनें । प्रभु को अपने जीवन चक्र की परिधि बना आनन्द को नष्ट न होने दें।
Subject
आनन्द-चक्र की परिधि