Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 936

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- असितः काश्यपो देवलो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
स꣢ सू꣣नु꣢र्मा꣣त꣢रा꣣ शु꣡चि꣢र्जा꣣तो꣢ जा꣣ते꣡ अ꣢रोचयत् । म꣣हा꣢न्म꣣ही꣡ ऋ꣢ता꣣वृ꣡धा꣢ ॥९३६॥

सः꣢ । सू꣣नुः꣢ । मा꣣त꣡रा꣢ । शु꣡चिः꣢꣯ । जा꣣तः꣢ । जा꣣ते꣡इति꣢ । अ꣡रोचयत् । महा꣣न् । म꣢ही꣢इति꣣ । ऋ꣣तावृ꣡धा꣢ । ऋ꣣त । वृ꣡धा꣢꣯ ॥९३६॥

Mantra without Swara
स सूनुर्मातरा शुचिर्जातो जाते अरोचयत् । महान्मही ऋतावृधा ॥

सः । सूनुः । मातरा । शुचिः । जातः । जातेइति । अरोचयत् । महान् । महीइति । ऋतावृधा । ऋत । वृधा ॥९३६॥

Samveda - Mantra Number : 936
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 6;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(सः) = वह सोम १. (सूनुः) = उत्तम प्रेरणा देनेवाला है— सोमरक्षा के द्वारा मनुष्य को सदा उत्थान की प्रेरणा प्राप्त होती है, २. (शुचिः) = यह अत्यन्त पवित्र वस्तु है और जीवन की पवित्रता का कारण है, ३. (जात:) = [जातम् अस्य अस्तीति] यह शक्तियों के प्रादुर्भाव व विकास का कारण है, ४. यह (महान्) = अत्यन्त (महनीय) = महत्त्वपूर्ण वस्तु है, ५. यह सोम (मातरा) = [माता च पिता च] = द्यावापृथिवी को–शरीर व मस्तिष्क को (अरोचयत्) = प्रकाशयुक्त करता है । जो शरीर और मस्तिष्क [क] जाते=उत्तम प्रादुर्भाववाले हैं, [ख] (मही) = महनीय व प्रशंसनीय हैं, [ग] (ऋतावृधा) = ऋतु के द्वारा - सब कार्यों को व्रत के रूप में ठीक समय व ठीक स्थान पर करने के द्वारा ये वृद्धि को प्राप्त होते हैं।
Essence
सोम शरीर को नीरोग बनाता है और मस्तिष्क को ज्ञान ज्योति से भरकर उज्ज्वल कर देता है।
Subject
सोम का शरीर व मस्तिष्क पर प्रभाव