Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 926

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- बृहन्मतिराङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
नू꣡ नो꣢ र꣣यिं꣢ म꣣हा꣡मि꣢न्दो꣣ऽस्म꣡भ्य꣢ꣳ सोम वि꣣श्व꣡तः꣢ । आ꣡ प꣢वस्व सह꣣स्रि꣡ण꣢म् ॥९२६॥

नु꣢ । नः꣣ । रयि꣢म् । म꣣हा꣢म् । इ꣣न्दो । अस्म꣡भ्य꣢म् । सोम । वि꣣श्व꣡तः꣢ । आ । प꣣वस्व । सहस्रि꣡ण꣢म् ॥९२६॥

Mantra without Swara
नू नो रयिं महामिन्दोऽस्मभ्यꣳ सोम विश्वतः । आ पवस्व सहस्रिणम् ॥

नु । नः । रयिम् । महाम् । इन्दो । अस्मभ्यम् । सोम । विश्वतः । आ । पवस्व । सहस्रिणम् ॥९२६॥

Samveda - Mantra Number : 926
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
‘बृहन्मति आङ्गिरस' प्रभु से प्रार्थना करता है – हे (इन्दो) = सर्वशक्तिमन् ! (सोम) = सकल ऐश्वर्यों के उत्पादक प्रभो ! १. (नु) = शीघ्र ही (न:) = हमारे (रयिम्) = ऐश्वर्य को (महान्) = महनीय व (सहस्त्रिणम्) = अनन्त, बहुत अधिक करके (अस्मभ्यम्) = हमारे लिए (विश्वतः) = सब ओर से (आपवस्व) = प्राप्त कराइए ।

'बृहन्मति आङ्गिरस' की रयि 'प्रज्ञा और शक्ति' है। बृहन्मति चाहता है कि प्रभु उसकी प्रज्ञा को महनीय बनाएँ और शक्ति को बहुत अधिक बढ़ाएँ । इस प्रज्ञा और शक्ति को वह सर्वतः प्राप्त करना चाहता है। उसका सारा वातावरण ही ऐसा हो जो 'प्रज्ञा और शक्ति' की वृद्धि के अनुकूल हो । सर्वतः प्राप्त करने का यही अभिप्राय है।
Essence
प्रभुकृपा से हमारी बुद्धि महनीय हो और हमारी शक्ति अत्यन्त बढ़ी हुई हो ।
Subject
‘बृहन्मति आङ्गिरस की रयि'