Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 921

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- दृढच्युत आगस्त्यः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
प꣡व꣢मान धि꣣या꣢ हि꣣तो꣡३ऽभि꣢꣫ योनिं꣣ क꣡नि꣢क्रदत् । ध꣡र्म꣢णा वा꣣यु꣢मारु꣢꣯हः ॥९२१॥

प꣡व꣢꣯मान । धि꣣या꣢ । हि꣣तः꣢ । अ꣣भि꣢ । यो꣡नि꣢꣯म् । क꣡नि꣢꣯क्रदत् । ध꣡र्म꣢꣯णा । वा꣣यु꣢म् । आ । अ꣣रुहः ॥९२१॥

Mantra without Swara
पवमान धिया हितो३ऽभि योनिं कनिक्रदत् । धर्मणा वायुमारुहः ॥

पवमान । धिया । हितः । अभि । योनिम् । कनिक्रदत् । धर्मणा । वायुम् । आ । अरुहः ॥९२१॥

Samveda - Mantra Number : 921
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. हे (पवमान) = पवित्र करनेवाले सोम! तू (धिया) = प्रज्ञानों व कर्मों के द्वारा (हितः) = शरीर में स्थापित किया हुआ है। सोम को शरीर में सुरक्षित करने और वासनाओं से बचने के लिए आवश्यक है कि मनुष्य ज्ञानोपार्जन में लगा रहे तथा कर्मशील बना रहे । २. यह सोम का रक्षक (योनिम्-अभि) = मूलस्थान परमेश्वर को लक्ष्य करके (कनिक्रदत्) = निरन्तर स्तुतिवचनों का उच्चारण करता है। सोम का रक्षक उस महान् सोम को क्यों न प्राप्त करेगा, ३. हे सोम ! (धर्मणा) = अपनी धारक शक्ति से तू (वायुम्) = इस क्रियाशील आत्मा को (आरुहः) = [आरोहय] उन्नति -पथ पर आरूढ़ कर । सोम का रक्षक अपना धारण तो करता ही है, यह सदा धारणात्मक कर्मों में लगा रहता है । 
Essence
सोम से बुद्धि व कर्मशक्ति बढ़ती है, मनुष्य प्रभु-प्रवण बनता है और धारक कर्मों में प्रवृत्त होकर उन्नति-पथ पर आगे बढ़ता है ।
Subject
उन्नति के पथ पर