Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 909

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- सुतंभर आत्रेयः Chhand- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
य꣣ज्ञ꣡स्य꣢ के꣣तुं꣡ प्र꣢थ꣣मं꣢ पु꣣रो꣡हि꣢तम꣣ग्निं꣡ न꣢꣯रस्त्रिषध꣣स्थे꣡ समि꣢꣯न्धते । इ꣡न्द्रे꣢ण दे꣣वैः꣢ स꣣र꣢थ꣣ꣳस꣢ ब꣣र्हि꣢षि꣣ सी꣢द꣣न्नि꣡ होता꣢꣯ य꣣ज꣡था꣢य सु꣣क्र꣡तुः꣢ ॥९०९॥

य꣡ज्ञ꣢स्य । के꣣तु꣢म् । प्रथ꣣म꣢म् । पु꣣रो꣡हि꣢तम् । पु꣣रः꣢ । हि꣣तम् । अग्नि꣢म् । न꣡रः꣢꣯ । त्रि꣣षधस्थे꣢ । त्रि꣣ । सधस्थे꣢ । सम् । इ꣡न्धते । इ꣡न्द्रे꣢꣯ण । दे꣣वैः꣢ । स꣣र꣡थ꣢म् । स꣣ । र꣡थ꣢꣯म् । सः । ब꣣र्हि꣡षि꣢ । सी꣡द꣢꣯त् । नि । हो꣡ता꣢꣯ । य꣣ज꣡था꣢य । सु꣣क्र꣡तुः꣢ । सु꣣ । क्रतुः ॥९०९॥१

Mantra without Swara
यज्ञस्य केतुं प्रथमं पुरोहितमग्निं नरस्त्रिषधस्थे समिन्धते । इन्द्रेण देवैः सरथꣳस बर्हिषि सीदन्नि होता यजथाय सुक्रतुः ॥

यज्ञस्य । केतुम् । प्रथमम् । पुरोहितम् । पुरः । हितम् । अग्निम् । नरः । त्रिषधस्थे । त्रि । सधस्थे । सम् । इन्धते । इन्द्रेण । देवैः । सरथम् । स । रथम् । सः । बर्हिषि । सीदत् । नि । होता । यजथाय । सुक्रतुः । सु । क्रतुः ॥९०९॥१

Samveda - Mantra Number : 909
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(नरः) = [नृ नये] अपने को उन्नति-पथ पर ले-चलनेवाले लोग (त्रिषधस्थे) = [त्रि+सधस्थ] तीन प्राणों के एकत्र होने के प्रदेश त्रिपुटी में अथवा इडा, पिंगला व सुषुम्णा नामक तीन नाड़ियों के सहस्थान में उस प्रभु को (सन्धिते) =  दीप्त करते हैं जो १. (यज्ञस्य केतुम्) = यज्ञों के प्रज्ञापक हैं, जिन्होंने वेदवाणी में सब यज्ञों का प्रतिपादन किया है, २. (प्रथमं पुरोहितम्) = सर्वश्रेष्ठ हित के आधायक हैं [पुर: हितं] अथवा सर्वमुख्य यज्ञ के संस्थापक हैं, सृष्टियज्ञ के रचनेवाले प्रभु ही तो हैं, (अग्निम्) = अग्रणी हैं । यहाँ त्रिषधस्थे का अर्थ 'जीव और परमात्मा के इकट्ठे बैठने के तीन स्थान' भी लिया जा 'वाणी' नामजपन सकता है। उनमें १. 'ब्रह्मरन्ध्र' ध्यान के लिए, २. 'हृदय' उपासना के लिए और ३. के लिए है।

(सः) = वह प्रभु जब इन त्रिषधस्थों में समिद्ध होते हैं तब (इन्द्रेण) = जीवात्मा के साथ (देवैः) = दिव्य गुणों के द्वारा (सरथम्) = शरीररूप समान रथ में (बर्हिषि) = जिसमें से वासनाओं का उद्बर्हण कर दिया गया है उस पवित्र बर्हि नामक हृदय में (नि सदत्) = निषण्ण होते हैं, अर्थात् ब्रह्मरन्ध्र, हृदय व वाणी में प्रभु के साथ जब जीव एक स्थान में स्थित होता है तब वह जितेन्द्रिय बनता है [इन्द्र], वह दिव्य गुणोंवाला होता है, [देवै:] और उसके हृदय में प्रभु आसीन होते हैं।

ये प्रभु ही वस्तुत: इस सुतम्भर के (होता) = यज्ञों को चलानेवाले होते हैं और वे प्रभु ही (यजथाय) = सब उत्तम यज्ञों के (सुक्रतुः) = उत्तम प्रज्ञान, कर्म व सङ्कल्पों को प्राप्त करानेवाले होते हैं । एवं, सुतम्भर से किये जाते हुए सब यज्ञ वस्तुतः उस प्रभु से सम्पादित हो रहे होते हैं । 
Essence
'प्रभु ही होता है, हम सब तो प्रभु की क्रीड़ा में निमित्तमात्र हो जाते हैं, इस भावना को जगाना ही सच्चा सुतम्भर बनना है ।
Subject
त्रिपुटी में प्रभु का ध्यान