Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 905

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- भृगुर्वारुणिर्जमदग्निर्भार्गवो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
प꣡व꣢मान रु꣣चा꣡रु꣢चा꣣ दे꣡व꣢ दे꣣वे꣡भ्यः꣢ सु꣣तः꣢ । वि꣢श्वा꣣ व꣢सू꣣न्या꣡ वि꣢श ॥९०५॥

प꣡व꣢꣯मान । रु꣣चा꣡रु꣢चा । रु꣣चा꣢ । रु꣣चा । दे꣡व꣢꣯ । दे꣣वे꣡भ्यः꣢ । सु꣣तः꣢ । वि꣡श्वा꣢꣯ । व꣡सू꣢꣯नि । आ । वि꣣श ॥९०५॥

Mantra without Swara
पवमान रुचारुचा देव देवेभ्यः सुतः । विश्वा वसून्या विश ॥

पवमान । रुचारुचा । रुचा । रुचा । देव । देवेभ्यः । सुतः । विश्वा । वसूनि । आ । विश ॥९०५॥

Samveda - Mantra Number : 905
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रभु मन्त्र के ऋषि भृगु से कहते हैं कि - हे (पवमान) = अपने जीवन को पवित्र करनेवाले ! हे (देव) = दिव्य गुणोंवाले ! तू (देवेभ्यः सुतः) = दिव्य गुणों को प्राप्त करने के लिए ही उत्पन्न हुआ है। तेरे जीवन का लक्ष्य दिव्य गुणों की प्राप्ति ही होना चाहिए। तू (रुचा रुचा) = एक-एक दीप्ति से, अर्थात् एक-एक ज्योति को प्राप्त करके (विश्वा) = सब (वसूनि) = शम-दम आदि उत्तम धनों को आविश= प्राप्त हो । इन वसुओं में तेरा प्रवेश हो । तू सब वसुओं को प्राप्त करनेवाला हो । 
Essence
भावार्थ–एक-एक करके हम सब वसुओं को प्राप्त करनेवाले हों ।
 
Subject
विश्व वसुओं की प्राप्ति