Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 902

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- बृहन्मतिराङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
आ꣣वि꣡वा꣢सन्परा꣣व꣢तो꣣ अ꣡थो꣢ अर्वा꣣व꣡तः꣢ सु꣣तः꣢ । इ꣡न्द्रा꣢य सिच्यते꣣ म꣡धु꣢ ॥९०२॥

आ꣣वि꣡वा꣢सन् । आ꣢ । वि꣡वा꣢꣯सन् । प꣣राव꣡तः꣢ । अ꣡थ꣢꣯ । उ꣣ । अर्वाव꣡तः꣢ । सु꣣तः꣢ । इ꣡न्द्रा꣢꣯य । सि꣣च्यते । म꣡धु꣢꣯ ॥९०२॥

Mantra without Swara
आविवासन्परावतो अथो अर्वावतः सुतः । इन्द्राय सिच्यते मधु ॥

आविवासन् । आ । विवासन् । परावतः । अथ । उ । अर्वावतः । सुतः । इन्द्राय । सिच्यते । मधु ॥९०२॥

Samveda - Mantra Number : 902
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
यह (सुतः) = यज्ञशील अथवा सोम का सम्पादन करनेवाला बृहन्मति (परावतः) = दूरस्थ लोगों के (अथ उ) = और (अर्वावत:) = समीपस्थ लोगों के (आविवासन्) = अन्धकार को दूर करनेवाला [विवास् to banish] होता है । यह बृहन्मति दूर व समीप – सर्वत्र भ्रमण करता हुआ अन्धकार को दूर करने के कार्य में लगा रहता है। इस कार्य में लोग इसके साथ कटु व्यवहार भी करते हैं, परन्तु यह अपने व्यवहार में कटुता नहीं आने देता । यह अपनी इन्द्रियों पर काबू रखता है और इस (इन्द्राय) = जितेन्द्रिय के लिए (मधु सिच्यते) = वाणी में मिठास का ही सेचन होता है । यह कभी कड़वी वाणी नहीं बोलता । 
Essence
बृहन्मति सदा मधुरवाणी से समीपस्थ व दूरस्थ लोगों के अज्ञान को दूर करने के लिए प्रयत्नशील होता है ।
Subject
मधुसिक्त वाणी से