Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 90

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- वामदेवः कश्यपो वा मारीचो मनुर्वा वैवस्वत अभौ वा Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
जा꣣तः꣡ परे꣢꣯ण꣣ ध꣡र्म꣢णा꣣ य꣢त्स꣣वृ꣡द्भिः꣢ स꣣हा꣡भु꣢वः । पि꣣ता꣢꣫ यत्क꣣श्य꣡प꣢स्या꣣ग्निः꣢ श्र꣣द्धा꣢ मा꣣ता꣡ मनुः꣢꣯ क꣣विः꣢ ॥९०

जा꣣तः꣢ । प꣡रे꣢꣯ण । ध꣡र्म꣢꣯णा । यत् । स꣣वृ꣡द्भिः꣢ । स꣣ । वृ꣡द्भिः꣢꣯ । स꣣ह꣢ । अ꣡भु꣢꣯वः । पि꣣ता꣢ । यत् । क꣣श्य꣡प꣢स्य । अ꣣ग्निः꣢ । श्र꣣द्धा꣢ । श्र꣣त् । धा꣢ । मा꣣ता꣢ । म꣡नुः꣢꣯ । क꣣विः꣢ ॥९०॥

Mantra without Swara
जातः परेण धर्मणा यत्सवृद्भिः सहाभुवः । पिता यत्कश्यपस्याग्निः श्रद्धा माता मनुः कविः ॥९०

जातः । परेण । धर्मणा । यत् । सवृद्भिः । स । वृद्भिः । सह । अभुवः । पिता । यत् । कश्यपस्य । अग्निः । श्रद्धा । श्रत् । धा । माता । मनुः । कविः ॥९०॥

Samveda - Mantra Number : 90
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 9;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(यत्)=क्योंकि (परेण)= सर्वोत्कृष्ट (धर्मणा) = धर्म के द्वारा तू (जात:)- विकसित हुआ है और (यत्)=क्योंकि (सवृद्भिः) = सह यज्ञों के साथ (अभुव:) = तूने अपने जीवन को युक्त किया है, अतः (कश्यपस्य) = तुझ ज्ञानी [ समझदार] का (अग्निः) = आगे ले-चलनेवाला प्रभु (पिता)=रक्षक हुआ है, (श्रद्धा) = सत्य का ही धारण करनेवाला तथा विकास का (माता)=निर्माण करनेवाला बना है, और (कवि:)=क्रान्तदर्शी, ज्ञानी (मनुः) = अवबोध को देनेवाला उपदेष्टा हुआ है।

मनुष्य का सर्वोत्कृष्ट धर्म 'ज्ञान-प्राप्ति' है। ('ब्रह्मचर्यं परो धर्म:')=ब्रह्मचर्य परम धर्म है, ब्रह्म=ज्ञान, चर्=उसका भक्षण | ब्रह्मचारी आचार्यकुल में २४, ३६ वा ४८ वर्ष रहकर ज्ञान का विकास करता है और फिर समय पर गृहस्थ में प्रवेश करता है।

गृहस्थ में उसे यज्ञमय जीवन बिताना है। यज्ञों को (स - वृत्) = साथ होनेवाले कहा है। ये यज्ञ सृष्टि के आरम्भ से ही जीव के साथ होनेवाले सवृत्  हैं, मनुष्य को चाहिए कि इन यज्ञों के साथ ही अपना जीवन व्यतीत करे और यज्ञों से ही फूले-फले।

इस प्रकार ज्ञान व यज्ञ - प्रधान जीवनवाले मनुष्य को रक्षक प्रभु आगे ले-चलता हुआ मोक्ष तक पहुँचा देता है। वह अपने जीवन में सत्य - विश्वास के साथ चलता है। यह सच्चा विश्वास उसके उत्कर्ष का साधक होता है।

प्रभु की कृपा से जिसे समय-समय पर क्रान्तदर्शी, तत्त्वज्ञानी उपदेष्टाओं का सङ्ग प्राप्त होता रहता है, वह उत्तम मनवाला बना रहता है। इस प्रकार निर्भयता, सत्य, विश्वास व सौमनस्य से युक्त होकर वह (वामदेव) = उत्तम गुणोंवाला होता है, (कश्यप:) = ज्ञानी बनता है और (मनुः)=औरों को भी अपने जीवन से बोध देनेवाला होता है। ये ही इस मन्त्र के ऋषि हैं।
Essence
हमारा जीवन ज्ञान व यज्ञ के लिए अर्पित हो। हम अपने को प्रभु - रक्षा का अधिकारी बनाएँ, सत्य - विश्वास से युक्त और सत्सङ्ग करनेवाले हों ।