Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 898

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- बृहन्मतिराङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
आ꣣शु꣡र꣢र्ष बृहन्मते꣣ प꣡रि꣢ प्रि꣣ये꣢ण꣣ धा꣡म्ना꣢ । य꣡त्र꣢ दे꣣वा꣢꣫ इति꣣ ब्रु꣡व꣢न् ॥८९८॥

आ꣣शुः꣡ । अ꣣र्ष । बृहन्मते । बृहत् । मते । प꣡रि꣢꣯ । प्रि꣣ये꣡ण꣢ । धा꣡म्ना꣢꣯ । य꣡त्र꣢꣯ । दे꣡वाः꣢ । इ꣡ति꣢꣯ । ब्रु꣡व꣢꣯न् ॥८९८॥

Mantra without Swara
आशुरर्ष बृहन्मते परि प्रियेण धाम्ना । यत्र देवा इति ब्रुवन् ॥

आशुः । अर्ष । बृहन्मते । बृहत् । मते । परि । प्रियेण । धाम्ना । यत्र । देवाः । इति । ब्रुवन् ॥८९८॥

Samveda - Mantra Number : 898
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
गत मन्त्र में वर्णन था कि जैसे पृथिवी-भ्रमण का केन्द्र सूर्य है उसी प्रकार मैं ज्ञान का केन्द्र बनूँ। इस प्रकार बना हुआ यह व्यक्ति प्रस्तुत मन्त्र का ऋषि 'बृहन्मति' [विशाल बुद्धिवाला] बन जाता है। ज्ञान के कारण ही समझदारी से चलता हुआ यह विषयों में न फँसने से ‘आङ्गिरस’ है।

इस ‘आङ्गिरस बृहन्मति' से प्रभु कहते हैं- हे (बृहन्मते) = विशाल बुद्धिवाले आङ्गिरस! तू (प्रियेण धाम्ना) = अति प्रिय तेज से (आशुः) = शीघ्रता से कार्यों में व्याप्त होनेवाला बनकर (परि अर्ष) = चारों ओर जानेवाला 'परिव्राजक' बन । सर्वत्र विचरण करता हुआ तू औरों के लिए उस ज्ञान के प्रकाश को दे जिसे तूने प्रभुकृपा से प्राप्त किया है । तू इस स्थिति में अपने जीवन का यापन कर यत्र= = जहाँ देवा:=‘अरे ये लोग तो देव हैं' इति इस प्रकार संसार ब्रुवन् - कहे । तेरा जीवन लोकहित में व्यतीत हो, तू लोगों की दृष्टि में 'देव' बन जा ।
Essence
हम बृहन्मति बनकर तेजस्विता से कार्य करते हुए इस प्रकार ज्ञान का प्रसार करें कि लोग हमें देव समझें। हमारे कार्यों में तेजस्विता हो, परन्तु तेजस्विता के साथ माधुर्य हो ।
Subject
बृहन्मति की माधुर्यमयी तेजस्विता