Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 894

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- मेध्यातिथिः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
शृ꣣ण्वे꣢ वृ꣣ष्टे꣡रि꣢व स्व꣣नः꣡ पव꣢꣯मानस्य शु꣣ष्मि꣡णः꣢ । च꣡र꣢न्ति वि꣣द्यु꣡तो꣢ दि꣣वि꣢ ॥८९४॥

शृ꣣ण्वे꣢ । वृ꣣ष्टेः꣢ । इ꣣व । स्वनः꣢ । प꣡व꣢꣯मानस्य । शु꣣ष्मि꣡णः꣢ । च꣡र꣢꣯न्ति । वि꣣द्यु꣡तः꣢ । वि꣣ । द्यु꣡तः꣢꣯ । दि꣣वि꣢ ॥८९४॥

Mantra without Swara
शृण्वे वृष्टेरिव स्वनः पवमानस्य शुष्मिणः । चरन्ति विद्युतो दिवि ॥

शृण्वे । वृष्टेः । इव । स्वनः । पवमानस्य । शुष्मिणः । चरन्ति । विद्युतः । वि । द्युतः । दिवि ॥८९४॥

Samveda - Mantra Number : 894
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
गत मन्त्र में वर्णित ‘'सुवित' प्रभु के सेतु का आश्रय करनेवाले को (पवमानस्य) = उस पवित्र करनेवाले तथा (शुष्मिणः) = कामादि शत्रुओं का शोषण करनेवाले बल से सम्पन्न प्रभु का (स्वनः) = शब्द (वृष्टेः स्वनः इव) = धर्ममेघ समाधि में होनेवाली आनन्द की वर्षा के शब्द की भाँति (शृण्वे) = सुनाई पड़ता है, अर्थात् उपासकों को पवित्र करनेवाले, शक्तिशाली प्रभु की हृदय में उठनेवाली वाणी सदा सुनाई पड़ती है। २. इन उपासकों के (दिवि) = द्योतनात्मक मस्तिष्क में (विद्युतः) = विशेष दीप्तियाँ (चरन्ति) = विचरण करती हैं, अर्थात् इनकी बुद्धि अत्यन्त सूक्ष्म होकर एक विशेष दीप्ति को देखती है।
 
Essence
उपासक को प्रभु का शब्द सुनाई पड़ता है और उसके मस्तिष्करूप गगन में ज्ञानविद्युत् का प्रकाश होता है ।
Subject
धर्ममेघ समाधि में पर्जन्यध्वनि