Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 891

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- अहमीयुराङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
प꣡व꣢मानस्य ते꣣ र꣢सो꣣ द꣢क्षो꣣ वि꣡ रा꣢जति द्यु꣣मा꣢न् । ज्यो꣢ति꣣र्वि꣢श्व꣣꣬ꣳ स्व꣢꣯र्दृ꣣शे꣢ ॥८९१॥

प꣡व꣢꣯मानस्य । ते꣣ । र꣡सः꣢꣯ । द꣡क्षः꣢꣯ । वि । रा꣣जति । द्युमा꣣न् । ज्यो꣡तिः꣢꣯ । वि꣡श्व꣢꣯म् । स्वः꣢ । दृ꣣शे꣢ ॥८९१॥

Mantra without Swara
पवमानस्य ते रसो दक्षो वि राजति द्युमान् । ज्योतिर्विश्वꣳ स्वर्दृशे ॥

पवमानस्य । ते । रसः । दक्षः । वि । राजति । द्युमान् । ज्योतिः । विश्वम् । स्वः । दृशे ॥८९१॥

Samveda - Mantra Number : 891
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(पवमानस्य) = पवित्र करनेवाले (ते) = आपकी प्राप्ति का (रसः) = आनन्द १. (दक्षः) = सब प्रकार की उन्नति growth का कारण है । २. यह रस (द्युमान्) = ज्योतिवाला होकर (विराजति) = विशेषरूप से दीप्त होता है। प्रभु-दर्शन करनेवाले की सर्वांगीण उन्नति तो होती ही है, उसे देदीप्यमान ज्ञान-ज्योति भी प्राप्त होती है। यह (विश्वं ज्योतिः) = पूर्ण प्रकाश (स्वः) = प्रभु के देदीप्यमान रूप के (दृशे) = देखने के लिए होता है अथवा यह (ज्योतिः) = प्रकाश (विश्वम्) = सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को तथा (स्वः) = स्वयं राजमान् प्रभु को दृशे = दिखलाने के लिए होती है। इस ज्ञान में परा व अपरा दोनों विद्याओं का समावेश है | 
Essence
प्रभु-दर्शन मेरी सर्वांगीण उन्नति का कारण बनता है । यह मुझे वह ज्योति प्राप्त कराता है, जिसमें प्रकृति व प्रभु दोनों प्रभासित होते हैं।
Subject
परा व अपरा विद्या