Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 882

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- गोषूक्त्यश्वसूक्तिनौ काण्वायनौ Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
त꣢द꣢द्या꣡ चि꣢त्त उ꣣क्थि꣡नोऽनु꣢꣯ ष्टुवन्ति पू꣣र्व꣡था꣢ । वृ꣡ष꣢पत्नी꣣रपो꣡ ज꣢या दि꣣वे꣡दि꣢वे ॥८८२॥

त꣢त् । अ꣣द्य꣢ । अ꣣ । द्य꣢ । चि꣣त् । ते । उक्थि꣡नः꣢ । अ꣡नु꣢꣯ । स्तु꣡वन्ति । पूर्व꣡था꣢ । वृ꣡ष꣢꣯पत्नीः । वृ꣡ष꣢꣯ । प꣣त्नीः । अपः꣢ । ज꣢य । दिवे꣡दि꣢वे । दि꣣वे꣢ । दि꣣वे ॥८८२॥

Mantra without Swara
तदद्या चित्त उक्थिनोऽनु ष्टुवन्ति पूर्वथा । वृषपत्नीरपो जया दिवेदिवे ॥

तत् । अद्य । अ । द्य । चित् । ते । उक्थिनः । अनु । स्तुवन्ति । पूर्वथा । वृषपत्नीः । वृष । पत्नीः । अपः । जय । दिवेदिवे । दिवे । दिवे ॥८८२॥

Samveda - Mantra Number : 882
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 6;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
पूर्व मन्त्र में ‘येन’ के साथ प्रस्तुत मन्त्र के 'तत्' का सम्बन्ध है । येन= क्योंकि आप आयु व मनु को प्रकाश, आह्लाद व दीप्ति [ज्योतींषि, मन्दान:, विराजसि] प्राप्त कराते हैं, (तत्) = अत: (ते) = आपके इस कार्य का (उक्थिन:) = स्तोता लोग (पूर्वथा) = सदा की भाँति (अद्याचित्) = आज भी (अनुष्टुवन्तिक्रमशः) = स्तवन करते हैं कि – 'हे प्रभो! आप ही ज्योति प्राप्त कराते हो, आप ही तृप्ति का अनुभव कराते हो और दीप्ति देते हो ।'

हे प्रभो! आप ही हमारे लिए (दिवे-दिवे) = दिन-प्रतिदिन (वृषपत्नीः) = धर्म की रक्षा करनेवाले (अपः) = कर्मों का (जय) = विजय करते हो । वस्तुतः आपकी दी हुई ज्योति व दीप्ति से ही हम उन कर्मों को कर पाते हैं, जो धर्मानुकूल होते हैं । इस ज्योति व दीप्ति के अभाव में ही हमसे पाप कर्म होते हैं। प्रभु के प्रकाश में हमारी चित्तवृत्ति धर्म-प्रवण होती है, उसी की कृपा से धर्म कर्मों में विजयसफलता प्राप्त होती है ।
Essence
हम धर्मानुकूल कर्म करें। उन कर्मों की सफलता में भी प्रभु की महिमा को देखते हुए निरहंकार बने रहें ।
Subject
धर्मानुकूल कर्म