Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 88

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- पूरुरात्रेयः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
बृ꣣हद्व꣢꣫यो꣣ हि꣢ भा꣣न꣡वेऽर्चा꣢꣯ दे꣣वा꣢या꣣ग्न꣡ये꣢ । यं꣢ मि꣣त्रं꣡ न प्रश꣢꣯स्तये꣣ म꣡र्ता꣢सो दधि꣣रे꣢ पु꣣रः꣢ ॥८८॥

बृ꣣ह꣢त् । व꣡यः꣢꣯ । हि । भा꣣न꣡वे꣢ । अ꣡र्च꣢꣯ । दे꣣वा꣡य꣢ । अ꣣ग्न꣡ये꣢ । यम् । मि꣣त्र꣢म् । मि꣣ । त्रं꣢ । न । प्र꣡श꣢꣯स्तये । प्र । श꣣स्तये । म꣡र्ता꣢꣯सः । द꣣धिरे꣢ । पु꣣रः꣢ । ॥८८॥

Mantra without Swara
बृहद्वयो हि भानवेऽर्चा देवायाग्नये । यं मित्रं न प्रशस्तये मर्तासो दधिरे पुरः ॥

बृहत् । वयः । हि । भानवे । अर्च । देवाय । अग्नये । यम् । मित्रम् । मि । त्रं । न । प्रशस्तये । प्र । शस्तये । मर्तासः । दधिरे । पुरः । ॥८८॥

Samveda - Mantra Number : 88
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 9;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
इस मन्त्र के ऋषि ‘पुरु' हैं - अपना पालन व पूरण करनेवाले, आसुर वृत्तियों से अपनी
रक्षा करनेवाले और अपनी न्यूनताओं को दूर करनेवाले। अपने समान उपासको को प्रेरणा देते हैं कि (बृहद् वयः) = इस बड़े जीवन को, वृद्धिशील व विस्तृत जीवन को (हि)= निश्चय से (भानवे)=दीप्ति के लिए अर्पित करो, अपना समय ज्ञान प्राप्ति में लगाओ। यही वास्तव में ज्ञानी-भक्त बनने का प्रकार है। ज्ञान-प्राप्ति में जीवन को अर्पित करके उस देवाय = ज्ञान की ज्योति से जगमग, द्योतमान (अग्नये) = सबसे अग्रस्थान में स्थित परमेष्ठी प्रभु के लिए अर्च= उपासना कर। प्रभु की उपासना का प्रकार प्रभु-जैसा बनना ही है। प्रभु ज्ञानमय, ज्ञान के पुञ्ज, शुद्ध और चिद्रूप हैं, जीव भी ज्ञान यज्ञ से प्रभु की अर्चना कर पाता है।

किस प्रभु की अर्चना करनी है? इस प्रश्न का उत्तर इन शब्दों में है कि (यम्) = जिस प्रभु को (मर्तासः)=संग्राम में बारम्बार मरनेवाले पुरुष (मित्रं न) = मित्र के समान (पुरः)= सामने (दधिरे) = स्थापित करते हैं। इस संसार में मानवमात्र का आसुर वृत्तियों से एक संघर्ष चल रहा है। उस संघर्ष में मनुष्य स्वयं जीत नहीं पाता। जीतने की तो बात ही क्या यह तो बार-बार मृत्यु का शिकार होता है। अन्त में यह अनुभवी और ज्ञानी बनकर इस प्रभु को सामने करता है। ये प्रभु (मि-त्र) = प्रमिति=मृत्यु से उसकी रक्षा करते हैं। ऐसा होनेपर मनुष्य आसुर वृत्तियों का शिकार होने से बच जाता है और उसका जीवन (प्रशस्तये) = उत्तमता के लिए होता है। अपने जीवनों को उत्तम बनाने का साधन यही है कि हम प्रभु को सदा अपने सामने रक्खें। वे प्रभु हमारी ढाल हैं, जो हमें सब आक्रमणों से सुरक्षित कर देते हैं। उस समय हमपर 'काम, क्रोध, लोभ' तीनों ही आक्रमण करने में विफल होते हैं और हम 'आत्रेय' इन तीनों से रहित होते हैं [अविद्यमानाः त्रयो यस्य] ।
Essence
 हमारा जीवन ज्ञान यज्ञ के लिए अर्पित हो तथा प्रभुरूपी ढाल हमें कामादि के वार से सुरक्षित करे।
Subject
जीवन ज्ञान के लिए