Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 871

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- त्रित आप्त्यः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
रा꣣यः꣡ स꣢मु꣣द्रा꣢ꣳश्च꣣तु꣢रो꣣ऽस्म꣡भ्य꣢ꣳ सोम वि꣣श्व꣡तः꣢ । आ꣡ प꣢वस्व सह꣣स्रि꣡णः꣢ ॥८७१॥

रा꣣यः꣢ । स꣣मुद्रा꣢न् । स꣣म् । उद्रा꣢न् । च꣣तु꣡रः꣢ । अ꣣स्म꣡भ्य꣢म् । सो꣣म । विश्व꣡तः꣢ । आ । प꣣वस्व । सहस्रि꣡णः꣢ ॥८७१॥

Mantra without Swara
रायः समुद्राꣳश्चतुरोऽस्मभ्यꣳ सोम विश्वतः । आ पवस्व सहस्रिणः ॥

रायः । समुद्रान् । सम् । उद्रान् । चतुरः । अस्मभ्यम् । सोम । विश्वतः । आ । पवस्व । सहस्रिणः ॥८७१॥

Samveda - Mantra Number : 871
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 5;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (सोम) = ‘उमा', अर्थात् ज्ञान से समवेत परमात्मन् ! (अस्मभ्यम्) = हमारे लिए (विश्वतः) = सब ओर से (आपवस्व) = प्राप्त कराइए । किसे ? वेदज्ञान को जो– १. (राय:) = धनों के (चतुरः समुद्रान्) = चार समुद्र ही हैं । ये चारों वेद वस्तुतः धर्म, अर्थ, काम, मोक्षरूप चार रत्नों के समुद्र ही हैं । अथवा प्रकृति का ज्ञान, जीव के कर्त्तव्यों का ज्ञान ही इनका धन है। २. यह वेदज्ञान (सहस्त्रिणः) = सहस्रों ऋचाओं से युक्त है। अथवा [हस्र-विकास] विकास से युक्त है । एवं, ज्ञान के समुद्रभूत इन चार वेदों से जहाँ हमारा ज्ञान बढ़ता है वहाँ हमारे जीवन का उस ज्ञान के द्वारा समुचित विकास होता है। ये ज्ञान-निधि हमें 'काम, क्रोध, लोभ' से तैराकर 'त्रित' [तीन को तैरनेवाले] बनाएगा । यह त्रित ही प्रभु को प्राप्त करनेवालों में उत्तम होने के कारण 'आप्त्य' कहलाता है।
Essence
हम ज्ञान के समुद्रभूत इन चारों वेदों का उपार्जन करके काम, क्रोध, लोभ को तैरकर प्रभु को प्राप्त करें – त्रित हों और आप्त्य बनें । 
Subject
ज्ञान की चार निधियाँ व ज्ञान के चार समुद्र
Footnote
नोट – प्रस्तुत तृच में वेदों को ‘तिस्रो वाच: ' तथा 'रायः समुद्रांश्चतुरः' इन दो रूपों में स्मरण करके स्पष्ट कर दिया है कि मन्त्र तो 'ऋग्, यजुः व सामरूप' तीन ही हैं, परन्तु वेद संख्या में चार है।