Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 87

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- गोपवन आत्रेयः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
वि꣣शो꣡वि꣢शो वो꣣ अ꣡ति꣢थिं वाज꣣य꣡न्तः꣢ पुरुप्रि꣣य꣢म् । अ꣣ग्निं꣢ वो꣣ दु꣢र्यं꣣ व꣡चः꣢ स्तु꣣षे꣢ शू꣣ष꣢स्य꣣ म꣡न्म꣢भिः ॥८७॥

वि꣣शो꣡वि꣢शः । वि꣣शः꣢ । वि꣣शः । वः । अ꣡ति꣢꣯थिम् । वा꣣जय꣡न्तः꣢ । पु꣣रुप्रिय꣢म् । पु꣣रु । प्रिय꣢म् । अ꣣ग्नि꣢म् । वः꣣ । दु꣡र्य꣢꣯म् । दुः । य꣣म् । व꣡चः꣢꣯ । स्तु꣣षे꣢ । शू꣣ष꣡स्य꣢ । म꣡न्म꣢꣯भिः ॥८७॥

Mantra without Swara
विशोविशो वो अतिथिं वाजयन्तः पुरुप्रियम् । अग्निं वो दुर्यं वचः स्तुषे शूषस्य मन्मभिः ॥

विशोविशः । विशः । विशः । वः । अतिथिम् । वाजयन्तः । पुरुप्रियम् । पुरु । प्रियम् । अग्निम् । वः । दुर्यम् । दुः । यम् । वचः । स्तुषे । शूषस्य । मन्मभिः ॥८७॥

Samveda - Mantra Number : 87
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 9;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(वः) = तुममें (विशः विशः) = प्रत्येक प्रजाको (अतिथिम्) = निरन्तर प्राप्त होनेवाले, दुःख के समय सदा सहायक होनेवाले (पुरुप्रियम्) = सबके पालक, पूरक तथा तृप्त करनेवाले (अग्निम्) = अग्रस्थान पर पहुँचानेवाले, (शूषस्य) = बल व सुख के (दुर्यम्) = धाम उस प्रभु को (वः) = तुममें से (वाजयन्तः) = शक्ति को चाहते हुए या अर्चना करते हुए लोग (मन्मभिः) = मनन के साथ (वचः) = वचन (स्तुषे) = कहते हैं।

वह प्रभु सुख में विस्मृत हो जाए, पर दुःख में तो मनुष्य को उसका स्मरण होता ही है और वस्तुत: दु:ख में जब कोई भी दूसरा सहायक नहीं होता उस समय वे प्रभु ही हमारे कष्टों का निवारण करते हैं। वे प्रत्येक के अतिथि हैं, निरन्तर उसे प्राप्त होनेवाले हैं। वे पुरु हैं—पालन व पूरण करनेवाले हैं। सबके रक्षक हैं और सबकी कमियों को सदा दूर किया करते हैं। इस प्रकार (प्रियम्) = तृप्त करनेवाले हैं। सब प्रकार से हमारी कमियों को दूर कर वे हमें आगे ले-चलते हैं और उन्नत कराते-कराते हमें 'परागति' = मोक्ष को भी प्राप्त कराते हैं।

वे प्रभु सुख व शक्ति के धाम हैं। 'शूष' शब्द शक्ति व सुख दोनों का वाचक है। इस शब्द की मूल धातु शूष उत्पन्न करने के अर्थ में आती है। वास्तव में सुख उत्पन्न करने व निर्माण में ही है और शक्ति भी वही है जो उत्पादक हो ।

इस मन्त्र में वर्णित गुणों में प्रीति होने पर इस स्तोता की इन्द्रियाँ विषय-वासनाओं की ओर जाती ही नहीं। वह दुःखियों का सहायक बनता है, अनाथों का पालन करता है, अपनी कमियों को दूर करने का प्रयत्न करता है, सभी का प्रिय होता है, आगे-आगे पग रखता है और निर्माण के कार्यों में आनन्द का अनुभव करता हुआ अपनी शक्ति को बढ़ाता है - यही उसकी आराधना होती है। एवं, इसकी इन्द्रियाँ विषय- पंक में लिप्त नहीं होतीं और यह पवित्र इन्द्रियोंवाला बनकर इस मन्त्र का ऋषि गो- पवन होता है। काम, क्रोध, लोभरूप तीनों नरक-द्वारों से दूर होने के कारण ‘अत्रि-पुत्र' कहलाता है [नहीं हैं तीनों जिसमें] । परिणामतः ‘अध्यात्मिक, आधिभौतिक व आधिदैविक' इन तीनों कष्टों से भी यह बचा रहता है। इसलिए भी यह 'अ-त्रि' है।
Essence
हम सदा विचारपूर्वक प्रभु के नामों से उसका स्तवन करें, हमें उन गुणों में प्रीति हो। (‘तयपस्तदर्थभावनम्) = प्रभु का जप और अर्थ का चिन्तन हमें भी उत्तम बनने की प्रेरणा दे।
Subject
अर्थभावनपूर्वक जप