Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 866

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- मेध्यातिथिः काण्वः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
क꣡ण्वे꣢भिर्धृष्ण꣣वा꣢ धृ꣣ष꣡द्वाजं꣢꣯ दर्षि सह꣣स्रि꣡ण꣢म् । पि꣣श꣡ङ्ग꣢रूपं मघवन्विचर्षणे म꣣क्षू꣡ गोम꣢꣯न्तमीमहे ॥८६६॥

क꣡ण्वे꣢꣯भिः । धृ꣣ष्णो । आ꣢ । धृ꣣ष꣢त् । वा꣡ज꣢꣯म् । द꣣र्षि । सहस्रि꣡ण꣢म् । पि꣣श꣡ङ्ग꣢रूपम् । पि꣣श꣡ङ्ग꣢ । रू꣣पम् । मघवन् । विचर्षणे । वि । चर्षणे । मक्षू । गो꣡म꣢꣯न्तम् । ई꣣महे ॥८६६॥

Mantra without Swara
कण्वेभिर्धृष्णवा धृषद्वाजं दर्षि सहस्रिणम् । पिशङ्गरूपं मघवन्विचर्षणे मक्षू गोमन्तमीमहे ॥

कण्वेभिः । धृष्णो । आ । धृषत् । वाजम् । दर्षि । सहस्रिणम् । पिशङ्गरूपम् । पिशङ्ग । रूपम् । मघवन् । विचर्षणे । वि । चर्षणे । मक्षू । गोमन्तम् । ईमहे ॥८६६॥

Samveda - Mantra Number : 866
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(धृष्णो) = अपनी उपस्थिति से हमारी सब वासनाओं का धर्षण करनेवाले प्रभो ! (मघवन्) = ज्ञानैश्वर्यसम्पन्न अथवा [मघ= मख] यज्ञरूप प्रभो ! हे (विचर्षणे) = विशेष द्रष्टः प्रभो ! आप (कण्वेभिः) = मेधावी पुरुषों के द्वारा (मक्षू) = शीघ्र ही हमें (वाजम्) = उस ज्ञानरूप शक्ति को दर्षि देते हैं जो १. (आधृषत्) = हमारे जीवनों में वासनाओं का समन्तात् धर्षण करती है और (सहस्त्रिणम्) = हमें सदा विकसित मुख-मुद्रा से [हस्र — विकास, स-सहित] युक्त करती है । ज्ञानियों से ज्ञान प्राप्त करके ज्ञान के दो परिणामों को हम अपने जीवनों में अनुभव करते हैं, एक तो यह कि हम अपने passions का – उत्तेजनाओं का धर्षण कर पाते हैं और दूसरी यह कि यह हमें सुख-दुःखमय इस संसार में निर्लेपभाव से रहने के योग्य, अतएव सदा विकसित मुख-मुद्रामय जीवनवाला बनाता है । हे प्रभो ! हम तो आपसे इसी (गोमन्तम्) = उत्तम ज्ञानेन्द्रियोंवाले [गाव: इन्द्रियाणि] उत्तम वेदवाणियोंवाले [गाव: वेदवाच:] उत्तम ज्ञानरश्मियोंवाले [गाव:= रश्मयः] (पिशंगरूपम्) = [पिश अवयवे, पिश-पीस डालना] वासनाओं को चूर्णीभूत कर डालनेवाले ज्ञान को ही ईमहे - माँगते हैं । इसी ज्ञान को प्राप्त करने के लिए प्रयत्न करते हैं ।
Essence
प्रभु की कृपा से प्रभुनिष्ठ, ज्ञान-कणों के संग्रहीता आचार्यों से ज्ञान कणों का संग्रह करके हम भी वासना - विनाश के द्वारा 'मेध्यातिथि काण्व' बनें ।
Subject
वासना-विनाश अथवा विकसित मुख-मुद्रा