Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 855

1875 Mantra
Devata- इन्द्राग्नी Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ह꣣थो꣢ वृ꣣त्रा꣡ण्यार्या꣢꣯ ह꣣थो꣡ दासा꣢꣯नि सत्पती । ह꣣थो꣢꣫ विश्वा꣣ अ꣢प꣣ द्वि꣡षः꣢ ॥८५५॥

ह꣣थः꣢ । वृ꣣त्रा꣡णि꣢ । आ꣡र्या꣢꣯ । ह꣣थः꣢ । दा꣡सा꣢꣯नि । स꣣त्पती । सत् । पतीइ꣡ति꣢ । ह꣡थः꣢ । वि꣡श्वा꣢꣯ । अ꣡प꣢꣯ । द्वि꣡षः꣢꣯ ॥८५५॥

Mantra without Swara
हथो वृत्राण्यार्या हथो दासानि सत्पती । हथो विश्वा अप द्विषः ॥

हथः । वृत्राणि । आर्या । हथः । दासानि । सत्पती । सत् । पतीइति । हथः । विश्वा । अप । द्विषः ॥८५५॥

Samveda - Mantra Number : 855
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
इन्द्र और अग्नि आर्य हैं । शक्ति और प्रकाश के तत्त्व हमारे जीवन को आर्य बनाते हैं । (आर्या) = हे हमारे जीवनों को उत्कृष्ट बनानेवाले इन्द्राग्नी ! आप (वृत्राणि) = ज्ञान की आवरणभूत वासनाओं को (हथः) = नष्ट करते हो । इन आवरणों के विनाश से हमारी ज्ञानाग्नि चमक उठती है ।

ये इन्द्राग्नी सत्पती हैं— सत्य का पालन करनेवालों के रक्षक हैं। जीवन को सूर्य-चन्द्रमा की भाँति नियमित गति से ले-चलना ही 'सत्' बनना है । ये इन्द्राग्नी, जोकि (सत्पती) = सत्पुरुषों के रक्षक हैं, ये (दासानि) = [दसु उपक्षये] क्षय के कारणभूत रोगकृमियों को (हथः) = नष्ट करते हैं । रोगकृमियों के विनाश से हमारे शरीर सुन्दर बनते हैं ।

ये इन्द्राग्नी जहाँ ज्ञान की आवरणभूत वासनाओं को नष्ट कर मस्तिष्क को उज्ज्वल बनाते हैं और रोगकृमियों को नष्ट करके शरीर को नीरोग करते हैं, वहाँ मन से भी (विश्वा:) = सब द्विषः-द्वेष की भावनाओं को (अपहथ:) = सुदूर भगा देते हैं । शरीर का मस्तिष्करूप द्युलोक ज्ञान से जगमगा उठता है, स्थूल शरीररूप पृथिवीलोक स्वास्थ्य की दृढ़ता से चमकने लगता है, तो मनरूप अन्तरिक्ष पवित्रता से प्रसन्न हो उठता है । एवं, ये इन्द्राग्नी त्रिलोकी को ही उज्ज्वल कर देते हैं ।
Essence
इन्द्राग्नी के विकास से हमारी त्रिलोकी उज्ज्वल बन जाए ।
Subject
लोकत्रय-दीप्ति