Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 851

1875 Mantra
Devata- मरुतः Rishi- मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
आ꣡दह꣢꣯ स्व꣣धा꣢꣫मनु꣣ पु꣡न꣢र्गर्भ꣣त्व꣡मे꣢रि꣣रे꣢ । द꣡धा꣢ना꣣ ना꣡म꣢ य꣣ज्ञि꣡य꣢म् ॥८५१॥

आ꣢त् । अ꣡ह꣢꣯ । स्व꣣धा꣢म् । स्व꣣ । धा꣢म् । अ꣡नु꣢꣯ । पु꣡नः꣢꣯ । ग꣣र्भत्व꣢म् । ए꣣रिरे꣢ । आ꣣ । इरिरे꣢ । द꣡धा꣢꣯नाः । ना꣡म꣢꣯ । य꣣ज्ञि꣡य꣢म् ॥८५१॥

Mantra without Swara
आदह स्वधामनु पुनर्गर्भत्वमेरिरे । दधाना नाम यज्ञियम् ॥

आत् । अह । स्वधाम् । स्व । धाम् । अनु । पुनः । गर्भत्वम् । एरिरे । आ । इरिरे । दधानाः । नाम । यज्ञियम् ॥८५१॥

Samveda - Mantra Number : 851
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
गत मन्त्र में प्रभु से मेल करने की भावना थी । यह मेल ही स्व-आत्मा का, धा=धारण है, इसी का नाम प्रस्तुत मन्त्र में 'स्वधा' है । (आत्-स्वधाम् + अनु) = आत्म-धारण के एकदम पश्चात् (अह) = निश्चय से (यज्ञियम्) = उपासना के योग्य (नाम) = उस प्रभु के नाम को (दधानः) = धारण करते हुए ये ‘मधुच्छन्दा वैश्वामित्र' (पुनर्गर्भत्वम्) = दुबारा जन्म में आने की स्थिति को (एरिरे) = अपने से कम्पित कर दूर कर देते हैं ।

मनुष्य को प्रयत्न करके प्रभु को अपने हृदय में प्रतिष्ठित करना चाहिए। तत्पश्चात् सदा उसके उपास्य नामों का स्मरण करते रहना चाहिए, जिससे एक बार बनी हुई वह प्रभु के धारण की स्थिति नष्ट न हो जाए।

जन्म-मरण के चक्र से छूटने का क्रम यह है कि मनुष्य अपने में ‘स्व'=‘आत्मा' का धारण करे, इसके लिए योग-मार्ग पर चलता हुआ साधना को परिपक्व करे । जब एक बार वह 'स्व' को धारण करने में समर्थ हो जाए तब वह सदा प्रभु के यज्ञिय नामों का स्मरण करनेवाला बने । सदा तद्भावभावित रहेगा तो अन्त में भी प्रभु का स्मरण करेगा और प्रभु को प्राप्त करनेवाला बनेगा। दूसरे शब्दों में 'पुनर्जन्म' से ऊपर उठ जाएगा।
Essence
हम प्रभु को अपने में धारण करें, प्रभु के नाम का स्मरण करें, जिससे जन्ममरणचक्र से मुक्त हो सकें ।
Subject
पुनर्गर्भत्व से ऊपर, चक्र से मुक्ति