Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 850

1875 Mantra
Devata- मरुत इन्द्रश्च Rishi- मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
इ꣡न्द्रे꣢ण꣣ स꣡ꣳ हि दृक्ष꣢꣯से संजग्मा꣣नो꣡ अबि꣢꣯भ्युषा । म꣣न्दू꣡ स꣢मा꣣न꣡व꣢र्च्चसा ॥८५०॥

इ꣡न्द्रे꣢꣯ण । सम् । हि । दृ꣡क्ष꣢꣯से । सं꣣जग्मानः꣢ । स꣣म् । जग्मानः꣢ । अ꣡बि꣢꣯भ्युषा । अ । बि꣣भ्युषा । मन्दू꣡ इति꣢ । स꣣मान꣡व꣢र्चसा । स꣣मान꣢ । व꣣र्चसा ॥८५०॥

Mantra without Swara
इन्द्रेण सꣳ हि दृक्षसे संजग्मानो अबिभ्युषा । मन्दू समानवर्च्चसा ॥

इन्द्रेण । सम् । हि । दृक्षसे । संजग्मानः । सम् । जग्मानः । अबिभ्युषा । अ । बिभ्युषा । मन्दू इति । समानवर्चसा । समान । वर्चसा ॥८५०॥

Samveda - Mantra Number : 850
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
गत मन्त्र की प्राणापान-साधना से जब जीव (इन्द्रेण) = उस परमैश्वर्यशाली परमात्मा से, जो (अबिभ्युषा) = किसी भी प्रकार के भय से रहित हैं, (हि) = निश्चय से (संजग्मान:) = मेल करता हुआ (संदृक्षसे) = दिखाई देता है तब हे जीव ! तू और यह प्रभु दोनों (मन्दू) = आनन्दस्वरूप दिखते हो तथा (समानवर्चसा) = समान शक्तिवाले हो जाते हो ।

योग-साधना से जब जीव का प्रभु से योग होता है तब वह सब भय और शोक को तैर जाता है (‘तरति शोकमात्मवित्') । प्रभु भीतिरहित हैं— प्रभु के सम्पर्क में जीव का जीवन भी भीतिरहित हो जाता है। उस समय यह एक आनन्द-रस का अनुभव करता है, क्योंकि प्रभु तो हैं ही रस । एवं, ये दोनों चेतनतत्त्व ‘मन्दू' आनन्दित होनेवाले हो जाते हैं। ये 'समानवर्चसा' तुल्य तेजवाले हो जाते हैं— अग्नि में पड़ा लोहा भी तो अग्नि ही हो जाता है । ' मैं प्रभु - जैसा ही तेजस्वी हो जाऊँ', ऐसी सर्वोत्तम इच्छा करनेवाला यह 'मधुच्छन्दा' है । राग-द्वेषातीत हो सभी के साथ प्रेमपूर्वक चलने से यह ‘वैश्वामित्र' है ।
 
Essence
प्रभु-उपासक प्रभु के साथ निवासरूप सायुज्य मुक्ति प्राप्त करके प्रभु जैसा ही आनन्दित व तेजस्वी बन जाता है ।
Subject
समान तेजवाले