Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 849

1875 Mantra
Devata- मित्रावरुणौ Rishi- मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
क꣣वी꣡ नो꣢ मि꣣त्रा꣡वरु꣢꣯णा तुविजा꣣ता꣡ उ꣢रु꣣क्ष꣡या꣢ । द꣡क्षं꣢ दधाते अ꣣प꣡स꣢म् ॥८४९॥

क꣣वी꣡इति꣢ । नः꣣ । मित्रा꣢ । मि꣣ । त्रा꣢ । व꣡रु꣢꣯णा । तु꣣विजातौ꣢ । तु꣣वि । जातौ꣢ । उ꣣रु꣡क्ष꣢या । उ꣣रु । क्ष꣡या꣢꣯ । द꣡क्ष꣢꣯म् । द꣣धातेइ꣡ति꣢ । अ꣣प꣡स꣢म् ॥८४९॥

Mantra without Swara
कवी नो मित्रावरुणा तुविजाता उरुक्षया । दक्षं दधाते अपसम् ॥

कवीइति । नः । मित्रा । मि । त्रा । वरुणा । तुविजातौ । तुवि । जातौ । उरुक्षया । उरु । क्षया । दक्षम् । दधातेइति । अपसम् ॥८४९॥

Samveda - Mantra Number : 849
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(मित्रावरुणा) = प्राण और अपान (न:) = हममें (अपसम्) = क्रियाशील (दक्षम्) = बल को (दधाते) = धारण करते हैं। इन प्राणापान की साधना से हममें उस बल का विकास होता है, जिससे हम सदा क्रियाशील बने रहते हैं। हम थककर लेट नहीं जाते। दसवें दशक में पहुँचकर भी हमारी क्रियाशीलता में अन्तर नहीं आता । ये प्राणापान कैसे हैं—

(कवी) = ये क्रान्तदर्शी हैं। ये अपने साधक को इतना सूक्ष्म बुद्धिवाला बनाते हैं कि वस्तुओं की गहराई तक जाकर यह वस्तुतत्त्व को समझनेवाला होता है। (तुवीजाता) = [तुवी = बहुत, जात: विकास] ये हमारे जीवन का महान् विकास करनेवाले होते हैं । वस्तुतः शरीर का स्वास्थ्य इन्हीं पर निर्भर करता है—ये ही चित्त की अशुद्धि का क्षय करनेवाले होते हैं तथा इन्हीं से ज्ञान की दीप्ति प्राप्त होती है।

(उरुक्षया) = [उरौ क्षयो याभ्याम्] इनके द्वारा हमारा अनन्त, विस्तृत [उरु] परमात्मा में निवास होता है। बुद्धि को सूक्ष्म करके ये प्राणापान हमें प्रभु-दर्शन के योग्य बनाते हैं। इनके द्वारा हृदयस्थ वासनाओं का नाश होता है और वह वासनाशून्य हृदय प्रभु के निवास के योग्य होता है । 
Essence
प्राणापान से बुद्धि तीव्र होती है, सर्वांगीण विकास होता है और अन्त में हमारा प्रभु में निवास होता है ।
 
Subject
सर्वांगीण विकास