Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 848

1875 Mantra
Devata- मित्रावरुणौ Rishi- मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ऋ꣣ते꣡न꣢ मित्रावरुणावृतावृधावृतस्पृशा । क्र꣡तुं꣢ बृ꣣ह꣡न्त꣢माशाथे ॥८४८॥

ऋ꣣ते꣡न꣢ । मि꣣त्रा । मि । त्रा । वरुणौ । ऋतावृधौ । ऋत । वृधौ । ऋतस्पृशा । ऋत । स्पृशा । क्र꣡तु꣢꣯म् । बृ꣣ह꣡न्त꣢म् । आ꣣शाथेइ꣡ति꣢ ॥८४८॥

Mantra without Swara
ऋतेन मित्रावरुणावृतावृधावृतस्पृशा । क्रतुं बृहन्तमाशाथे ॥

ऋतेन । मित्रा । मि । त्रा । वरुणौ । ऋतावृधौ । ऋत । वृधौ । ऋतस्पृशा । ऋत । स्पृशा । क्रतुम् । बृहन्तम् । आशाथेइति ॥८४८॥

Samveda - Mantra Number : 848
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(ऋतावृधा) = [ऋत सत्यनाम, यज्ञनाम–नि० ४.१९] सत्य और यज्ञ के द्वारा बढ़नेवाले तथा (ऋतस्पृशा) = [ऋतं रेत: – नि० ३.४] शक्ति देनेवाले [स्पर्शनं प्रतिपादनं] (मित्रावरुणा) = प्राणापान (ऋतेन) = मन से [जै० उ० ३.३६.५] (बृहन्तं क्रतुम्) = विशाल यज्ञों को अथवा बहुत बड़ी शक्ति को [क्रतुम्=Power] (आशाथे) = व्याप्त करते हैं ।

प्राणापान की वृद्धि के लिए यज्ञमय जीवन आवश्यक है । यज्ञमय जीवन सरल जीवन है, उसमें छल-छिद्र की पेचीदगियाँ नहीं हैं। कुटिलताएँ प्राणशक्ति की विघातक हैं। इसी प्रकार असत्य भी प्राणशक्ति का ह्रास करनेवाला है।

= ये प्राणापान यज्ञ और सत्य से बढ़कर हमारी शक्ति को बढ़ानेवाले हैं। प्राणापान की साधना ही वीर्य की ऊर्ध्वगति का कारण बनती है और शरीर में सुरक्षित ऋत रेतस् [वीर्य] मनुष्य को अनन्त शक्ति प्राप्त कराता है। प्राणापान की साधना से मन की निर्मलता भी सिद्ध होती है और यह निर्मल मन सदा यज्ञात्मक कर्मों में लगा रहता है ।
Essence
प्राणापान सत्य व यज्ञों से बढ़ते हैं। हमारे जीवनों को ये शक्तिशाली बनाते हैं
Subject
अद्भुत शक्ति