Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 839

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- कविर्भार्गवः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ꣡धा꣢ हिन्वा꣣न꣡ इ꣢न्द्रि꣣यं꣡ ज्यायो꣢꣯ महि꣣त्व꣡मा꣢नशे । अ꣣भिष्टिकृ꣡द्विच꣢꣯र्षणिः ॥८३९॥

अ꣡ध꣢꣯ । हि꣡न्वानः꣢ । इ꣣न्द्रिय꣢म् । ज्या꣡यः꣢꣯ । म꣣हित्व꣢म् । आ꣣नशे । अभिष्टिकृ꣢त् । अ꣣भिष्टि । कृ꣢त् । वि꣡च꣢꣯र्षणिः । वि । च꣣र्षणिः ॥८३९॥

Mantra without Swara
अधा हिन्वान इन्द्रियं ज्यायो महित्वमानशे । अभिष्टिकृद्विचर्षणिः ॥

अध । हिन्वानः । इन्द्रियम् । ज्यायः । महित्वम् । आनशे । अभिष्टिकृत् । अभिष्टि । कृत् । विचर्षणिः । वि । चर्षणिः ॥८३९॥

Samveda - Mantra Number : 839
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
हे जीव ! ('दिवः रयि:') = ज्ञान का प्रकाश तो तुझे प्राप्त होता ही है । (अध) = अब (इन्द्रियम्) = इन्द्रियों की शक्ति – बल को (हिन्वान:) = प्राप्त करता हुआ तू (ज्याय: महित्वम्) = उत्कृष्ट महत्त्व को (आनशे) = प्राप्त करता है।‘ब्रह्म’ के साथ ‘क्षत्र' के मिल जाने से सोने में सुगन्ध हो जाती है। (अभिष्टिकृत्) = इस ब्रह्म व क्षत्र के मेल से तू सब अभीष्टों को – सब मनोरथों को पूर्ण करनेवाला होता है। अथवा [अभिष्टि worship] तू सच्ची उपासना करनेवाला होता है तथा (विचर्षणिः) = तू विशिष्ट द्रष्टावस्तुओं को ठीक रूप में देखनेवाला होता है। ब्रह्म और क्षत्र का मेल ही ज्ञान और क्रिया का समन्वय है । अकेला ज्ञान पङ्गु है, अकेली क्रिया अन्धी। दोनों का सम्बन्ध मानव-जीवन को पङ्गुत्व व अन्धत्व से ऊपर उठाकर प्रकाशमय व क्रियाशील बनाता है, इसी से उसे महा महिमा प्राप्त होती
है।
Essence
हम ब्रह्म व क्षत्र का मेल करते हुए अपने जीवन को महत्त्वशाली बनाएँ ।
Subject
महान् महिमा