Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 838

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- कविर्भार्गवः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ꣡त꣢स्त्वा र꣣यि꣢र꣣꣬भ्य꣢꣯य꣣द्रा꣡जा꣢नꣳ सुक्रतो दि꣣वः꣢ । सु꣣पर्णो꣡ अ꣢व्य꣣थी꣡ भ꣢रत् ॥८३८॥

अ꣡तः꣢꣯ । त्वा꣣ । रयिः꣢ । अ꣣भि꣢ । अ꣢यत् । रा꣡जा꣢꣯नम् । सु꣣क्रतो । सु । क्रतो । दिवः꣢ । सु꣣प꣢र्णः । सु꣣ । पर्णः꣢ । अ꣣व्यथी꣢ । अ꣣ । व्यथी꣢ । भ꣣रत् ॥८३८॥

Mantra without Swara
अतस्त्वा रयिरभ्ययद्राजानꣳ सुक्रतो दिवः । सुपर्णो अव्यथी भरत् ॥

अतः । त्वा । रयिः । अभि । अयत् । राजानम् । सुक्रतो । सु । क्रतो । दिवः । सुपर्णः । सु । पर्णः । अव्यथी । अ । व्यथी । भरत् ॥८३८॥

Samveda - Mantra Number : 838
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (सुक्रतो) = उत्तम सङ्कल्पों व कर्मोंवाले जीव ! (राजानम्) - बड़े नियमित जीवनवाले [राज्, Regulate] (त्वा) = तुझे, (अत:) = क्योंकि तू पुरुषार्थ-शून्य प्रार्थना में नहीं लगा, इसलिए (दिवः रयिः) = यह ज्ञान धन (अभ्ययत्) = प्राप्त होता है। ‘तू पुरुषार्थ में लगा है, तेरा जीवन बड़ा नियमित है।' (सुपर्णः) = उत्तम ढंग से अपना पालन-पोषण करनेवाला, नियमित गति से अपने जीवन को चलानेवाला (अव्यथी) = कर्म से कभी परे न हटनेवाला, अनथक व्यक्ति (भरत्) = अपने को इष्ट वस्तुओं का पात्र बनाता ही है। उत्तम गतिवाले अनथक व्यक्ति की प्रार्थना पूरी होती ही है । 
Essence
हम उत्तम प्रार्थनाएँ तो करें ही, उन वस्तुओं के लिए पूर्ण पुरुषार्थ भी करें ।