Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 837

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- कविर्भार्गवः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
सं꣡वृ꣢क्तधृष्णु꣣꣬मुक्थ्यं꣢꣯ म꣣हा꣡म꣢हिव्रतं꣣ म꣡द꣢म् । श꣣तं꣡ पुरो꣢꣯ रुरु꣣क्ष꣡णि꣢म् ॥८३७॥

सं꣡वृ꣢꣯क्तधृष्णुम् । सं꣡वृ꣢꣯क्त । धृ꣣ष्णुम् । उक्थ्य꣢म् । म꣣हा꣡म꣢हिव्रतम् । म꣣हा꣢ । म꣣हिव्रतम् । म꣡द꣢꣯म् । श꣣त꣢म् । पु꣡रः꣢꣯ । रु꣣रु꣡क्षि꣢णम् ॥८३७॥

Mantra without Swara
संवृक्तधृष्णुमुक्थ्यं महामहिव्रतं मदम् । शतं पुरो रुरुक्षणिम् ॥

संवृक्तधृष्णुम् । संवृक्त । धृष्णुम् । उक्थ्यम् । महामहिव्रतम् । महा । महिव्रतम् । मदम् । शतम् । पुरः । रुरुक्षिणम् ॥८३७॥

Samveda - Mantra Number : 837
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(संवृक्तधृष्णुम्) = [वृजी वर्जने, धृष्णु शत्रु] = दूर किये हैं कामादि शत्रु जिसने, (उक्थ्यम्) = अत्यन्त प्रशंसनीय (महामहिव्रतम्) = बड़े-बड़े महनीय व्रतोंवाले (मदम्) = आनन्दमय तथा (शतं पुरः) = सैकड़ों देहरूप नगरियों को (रुरुक्षणिम्) = [रुजो भंगे] नष्ट करनेवाले आपकी हे प्रभो ! (सुकृत्यया ईमहे) = [ये दोनों शब्द पिछले मन्त्र से अनुवृत्त हो रहे हैं] उत्तम पुरुषार्थ के साथ हम याचना करते हैं । वस्तुत: जिन

गुणों की प्रार्थना करनी होती है उन्हीं गुणों से विशिष्ट प्रभु का स्तवन चलता है, अतः प्रार्थना का स्वरूप यह है कि मैं शत्रुओं — काम आदि वासनाओं को जीत जाऊँ, मेरा जीवन प्रशस्य हो, मैं महनीय व्रतोंवाला बनूँ, मेरा जीवन उल्लासमय हो और मैं इन शतशः बन्धनों का तोड़नेवाला बनूँ। 
Essence
हम पुरुषार्थ से बन्धनों को तोड़कर प्रभु को प्राप्त करें ।
Subject
उत्तम-प्रार्थना