Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 836

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- कविर्भार्गवः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
तं꣡ त्वा꣢ नृ꣣म्णा꣢नि꣣ बि꣡भ्र꣢तꣳ स꣣ध꣡स्थे꣢षु म꣣हो꣢ दि꣣वः꣢ । चा꣡रु꣢ꣳ सुकृ꣣त्य꣡ये꣢महे ॥८३६॥

त꣢म् । त्वा꣣ । नृम्णा꣡नि꣢ । बि꣡भ्र꣢꣯तम् । स꣣ध꣡स्थे꣢षु । स꣣ध꣡ । स्थे꣣षु । महः꣢ । दि꣣वः꣢ । चा꣡रु꣢꣯म् । सु꣣कृत्य꣡या꣢ । सु꣣ । कृत्य꣡या꣢ । ई꣣महे ॥८३६॥

Mantra without Swara
तं त्वा नृम्णानि बिभ्रतꣳ सधस्थेषु महो दिवः । चारुꣳ सुकृत्ययेमहे ॥

तम् । त्वा । नृम्णानि । बिभ्रतम् । सधस्थेषु । सध । स्थेषु । महः । दिवः । चारुम् । सुकृत्यया । सु । कृत्यया । ईमहे ॥८३६॥

Samveda - Mantra Number : 836
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
‘कवि भार्गव’=ज्ञानी, परिपक्व बुद्धिवाला व्यक्ति प्रार्थना करता है कि– हे प्रभो ! (तं त्वा) = उस आपको (सधस्थेषु) = सह स्थानों में – मिलकर बैठने के स्थानों में अथवा हृदयों में [हृदय जीव और प्रभु का सहस्थान है] (सुकृत्यया) - उत्तम पुरुषार्थ के साथ, अर्थात् स्वयं पुरुषार्थ करते हुए (ईमहे) = याचना करते हैं।‘प्रार्थना पुरुषार्थ के उपरान्त ही करनी चाहिए' इस आचार्य-वचन का मूल यह 'सुकृत्यया' शब्द ही है। बिना कर्म व पुरुषार्थ के आलसी बनकर बैठे हुओं की प्रार्थना नहीं सुनी जाती ।

मैं उन आपकी प्रार्थना करता हूँ जो आप १. (नृम्णानि) - बलों को [नि० २.९.९] (महः) = तेज को (दिव:) = ज्ञान के प्रकाशों को तथा (चारुम्) = सब शुभों को (बिभ्रतम्) = धारण कर रहे हैं। मेरे पुरुषार्थ के अनुसार 'बल-तेज-प्रकाश व शुभ' को आप मुझे प्राप्त कराते हैं ।
Essence
हमें पूर्ण पुरुषार्थ करके 'नृम्ण, बल, तेज, प्रकाश व शुभ' को प्राप्त करनेवाला बनना है ।
Subject
नृम्ण-महस्-दिव् व चारु