Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 833

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- भृगुर्वारुणिर्जमदग्निर्भार्गवो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
रा꣡जा꣢ मे꣣धा꣡भि꣢रीयते꣣ प꣡व꣢मानो म꣣ना꣡वधि꣢꣯ । अ꣣न्त꣡रि꣢क्षेण꣣ या꣡त꣢वे ॥८३३॥

रा꣡जा꣢꣯ । मे꣣धा꣡भिः꣢ । ई꣣यते । प꣡व꣢꣯मानः । म꣡नौ꣢ । अ꣡धि꣢꣯ । अ꣣न्त꣡रि꣢क्षेण । या꣡त꣢꣯वे ॥८३३॥

Mantra without Swara
राजा मेधाभिरीयते पवमानो मनावधि । अन्तरिक्षेण यातवे ॥

राजा । मेधाभिः । ईयते । पवमानः । मनौ । अधि । अन्तरिक्षेण । यातवे ॥८३३॥

Samveda - Mantra Number : 833
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
‘सोम' ही राजा है - यह शरीर को सभी दीप्तियाँ प्राप्त करानेवाला है । १. (राजा) = यह दीप्ति का कारणभूत सोम मनौ (अधि) = मननशील मनुष्य में २. (पवमान:) = पवित्रता करता हुआ ३. (मेधाभिः) = धारणावती बुद्धियों के साथ (ईयते) = प्राप्त होता है । ४. इन मेधाओं को वह (अन्तरिक्षेण यातवे) = हमें मध्यमार्ग से चलने के लिए प्राप्त कराता है । मेधावी मनुष्य अति का परिवर्जन करता हुआ मध्यमार्ग से ही चलता है ।
Essence
सोमरक्षा से १. हमें दीप्ति प्राप्त होगी । २. पवित्रता का लाभ होगा। ३. मेधावी बनकर ४. हम सदा मध्यमार्ग से चलेंगे।
Subject
मध्यमार्ग से जाने के लिए