Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 830

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- जमदग्निर्भार्गवः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ए꣣त꣡ अ꣢सृग्र꣣मि꣡न्द꣢वस्ति꣣रः꣢ प꣣वि꣡त्र꣢मा꣣श꣡वः꣢ । वि꣡श्वा꣢न्य꣣भि꣡ सौभ꣢꣯गा ॥८३०॥

ए꣣ते꣢ । अ꣣सृग्रम् । इ꣡न्द꣢꣯वः । ति꣣रः꣢ । प꣣वि꣡त्र꣢म् । आ꣣श꣡वः꣢ । वि꣡श्वा꣢꣯नि । अ꣣भि꣢ । सौ꣡भ꣢꣯गा । सौ । भ꣣गा ॥८३०॥

Mantra without Swara
एत असृग्रमिन्दवस्तिरः पवित्रमाशवः । विश्वान्यभि सौभगा ॥

एते । असृग्रम् । इन्दवः । तिरः । पवित्रम् । आशवः । विश्वानि । अभि । सौभगा । सौ । भगा ॥८३०॥

Samveda - Mantra Number : 830
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(एते) = ये (आशवः) = मनुष्य को शीघ्रता से कार्यों में व्याप्त करनेवाले, शक्ति- उत्पादन के द्वारा मनुष्य में स्फूर्ति उत्पन्न करनेवाले (इन्दवः) = शक्तिशाली सोमकण [१] (तिरः पवित्रम्) = सर्वत्र अन्तर्हित, सभी को पवित्र करनेवाले प्रभु को तथा (विश्वानि सौभगा) = सब सौभगों को (अभि) = लक्ष्य करके (असृग्रम्) = उत्पन्न किये गये हैं।

सोमकण ‘आशु' हैं— 'इन्दु' हैं । ये सुरक्षित होने पर स्फूर्ति व शक्ति को जन्म देनेवाले हैं । ये उत्पन्न इसलिए किये गये हैं कि १. उस सर्वव्यापक, परन्तु अन्तर्हित प्रभु का दर्शन हमारे जीवनों को पवित्र करनेवाला है । २. इनके उत्पादन का दूसरा प्रयोजन यह है कि सभी सौभग हमें प्राप्त हों। ये सौभग ‘ऐश्वर्य, वीर्य, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य' हैं । इनको प्राप्त करके हमारा जीवन चमक उठता है । एवं, सोम निःश्रेयस को भी देनेवाला है— अभ्युदय का भी साधक है । सोम की रक्षा करनेवाला सब सौभगों से युक्त 'जमदग्नि' अन्त तक ठीक जाठराग्निवाला बनता है। इन सौभगों के कारण उसे आधिव्याधियाँ नहीं सतातीं । अपना ठीक परिपाक करने से यह प्रभु - दर्शन करनेवाला 'भार्गव' बनता है ।
Essence
मैं सोम- रक्षा के द्वारा इस जीवन में सौभगों को प्राप्त करूँ और प्रभुदर्शन करके पवित्र-जीवनवाला बनूँ।
Subject
प्रभु-प्राप्ति व सौभग-लाभ