Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 826

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- श्रुतकक्षः सुकक्षो वा आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
मो꣢꣫ षु ब्र꣣ह्मे꣡व꣢ तदिन्द्र꣣यु꣡र्भुवो꣢꣯ वाजानां पते । म꣡त्स्वा꣢ सु꣣त꣢स्य꣣ गो꣡म꣢तः ॥८२६॥

मा । उ꣣ । सु꣢ । ब्र꣣ह्मा꣢ । इ꣣व । तन्द्रयुः꣢ । भु꣡वः꣢꣯ । वा꣣जानाम् । पते । म꣡त्स्व꣢꣯ । सु꣣त꣡स्य꣢ । गो꣡म꣢꣯तः ॥८२६॥

Mantra without Swara
मो षु ब्रह्मेव तदिन्द्रयुर्भुवो वाजानां पते । मत्स्वा सुतस्य गोमतः ॥

मा । उ । सु । ब्रह्मा । इव । तन्द्रयुः । भुवः । वाजानाम् । पते । मत्स्व । सुतस्य । गोमतः ॥८२६॥

Samveda - Mantra Number : 826
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 6;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रभु सुकक्ष से कहते हैं कि -

१. (सुब्रह्मा इव) = उत्तम चतुर्वेदवेत्ता के समान ज्ञानी बनकर तू (मा उ) = मत ही (तन्द्रयुः) = आलसी (भुवः) = होना । ज्ञान-प्राप्ति में कभी आलस्य नहीं करना । (चतुर्वेदवेत्ता) = सा बनकर भी ज्ञान प्राप्ति में लगे ही रहना । ('अनन्तपारं किल शब्दशास्त्रम्') = शब्दशास्त्र अनन्तपार है। ज्ञान का अन्त समझकर तुझे आलस्य न घेर ले । तू यह न समझ बैठे कि जो कुछ ज्ञातव्य था वह मैंने जान ही लिया है, अब आगे पढ़कर क्या करना ?

२. (वाजानां पते) = वाजों के पति बननेवाले सुकक्ष वाज-प्राप्ति में भी तूने (तन्द्रयुः) = आलसी (मा भुवः) = नहीं होना । ज्ञान के साथ शक्तिसंचय को भी तूने भूल नहीं जाना ।

है ३. (गोमतः) = प्रशस्त इन्द्रियों व वेदवाणियोंवाले (सुतस्य) = यज्ञ का तू (मत्स्व) = आनन्द ले, अर्थात् तुझे यज्ञात्मक कर्मों में आनन्द का अनुभव हो । तू इनको अपनी इन्द्रियों को प्रशस्त करनेवाला समझ । इनके द्वारा तेरा वेदवाणियों से सम्पर्क भी हो जाता है और तू विषयों में फँसने से बच जाता ।
Essence
हम ज्ञान प्राप्ति में कभी आलस्य न करें – शक्ति सञ्चय में सदा अतृप्त रहें – यज्ञों में मस्त रहें ।
Subject
ज्ञान-शक्ति-यज्ञ