Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 825

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- श्रुतकक्षः सुकक्षो वा आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ए꣣वा꣢ रा꣣ति꣡स्तु꣢विमघ꣣ वि꣡श्वे꣢भिर्धायि धा꣣तृ꣡भिः꣢ । अ꣡धा꣢ चिदिन्द्र नः꣣ स꣡चा꣢ ॥८२५॥

ए꣣व꣢ । रा꣣तिः꣢ । तु꣣विमघ । तुवि । मघ । वि꣡श्वे꣢꣯भिः । धा꣣यि । धातृ꣡भिः꣢ । अ꣡ध꣢꣯ । चि꣣त् । इन्द्र । नः । स꣡चा꣢꣯ ॥८२५॥

Mantra without Swara
एवा रातिस्तुविमघ विश्वेभिर्धायि धातृभिः । अधा चिदिन्द्र नः सचा ॥

एव । रातिः । तुविमघ । तुवि । मघ । विश्वेभिः । धायि । धातृभिः । अध । चित् । इन्द्र । नः । सचा ॥८२५॥

Samveda - Mantra Number : 825
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 6;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
श्रुतकक्ष' - ज्ञान को ही अपनी शरण बनानेवाला ('सुकक्ष') = उत्तम शरणवाला ('आंगिरस') = शक्तिशाली प्रस्तुत मन्त्र का ऋषि समझता है कि (एवा) = [truly, realy] = सचमुच (विश्वेभिः धातृभिः) = संसार में सब धारण करनेवालों से हे (तुवीमघ) = अनन्त ऐश्वर्यवाले प्रभो ! (रातिः) = आपका दान ही धायि धारण किया जाता है। संसार में जिस-जिस मनुष्य के पास धन है और जो धन से अपने को औरों का धारण करता हुआ समझता है, वह सब धन वस्तुत: उस प्रभु के द्वारा ही उसके पास रक्खा गया है। वह व्यक्ति तो उस धन का ट्रस्टीमात्र है। सामान्यतः संसार में मनुष्य अपने को ही इस धन का धनी समझने लगता है। उस समय प्रभु का सत्य स्वरूप इस धन के द्वारा इससे ओझल कर दिया जाता है। 

जब यह इस सत्यता को जान लेता है कि मैं तो प्रभु के धन को ही धारण करनेवाला हूँ, इसमें मेरा कुछ नहीं तब वह हिरण्यमय पात्र का ढक्कन उठ जाता है, (अधा) = और अब (चित्) = निश्चय से हे (इन्द्र) = ऐश्वर्यशाली प्रभो ! आप (नः) = हमारे (सचा) = साथी होते हो । मनुष्य धन का अपने को धारकमात्र समझे तो उसका घमण्ड समाप्त हो जाता है। उसके ज्ञानचक्षु पर लोभ का पर्दा नहीं आता और वह परमेश्वर का मित्र बन पाता है ।
Essence
हम श्रुतकक्ष बनें । अपने को धन का धारकमात्र समझें और प्रभु का दर्शन करें।
Subject
धन या इन्द्र