Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 823

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- पृष्णयोऽजाः Chhand- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
अ꣣यं꣡ पु꣢ना꣣न꣢ उ꣣ष꣡सो꣢ अरोचयद꣣य꣡ꣳ सिन्धु꣢꣯भ्यो अभवदु लोक꣣कृ꣢त् । अ꣣यं꣢꣫ त्रिः स꣣प्त꣡ दु꣢दुहा꣣न꣢ आ꣣शि꣢र꣣ꣳ सो꣡मो꣢ हृ꣣दे꣡ प꣢वते꣣ चा꣡रु꣢ मत्स꣣रः꣢ ॥८२३॥

अ꣣य꣢म् । पु꣣ना꣢नः । उ꣣ष꣡सः꣢ । अ꣣रोचयत् । अय꣢म् । सि꣡न्धु꣢꣯भ्यः । अ꣣भवत् । उ । लोककृ꣢त् । लो꣣क । कृ꣢त् । अ꣣य꣢म् । त्रिः । स꣣प्त꣢ । दु꣣दुहानः꣢ । आ꣣शि꣡र꣢म् । आ꣣ । शि꣡र꣢꣯म् । सो꣡मः꣢꣯ । हृ꣣दे꣢ । प꣣वते । चा꣡रु꣢꣯ । म꣣त्स꣢रः ॥८२३॥

Mantra without Swara
अयं पुनान उषसो अरोचयदयꣳ सिन्धुभ्यो अभवदु लोककृत् । अयं त्रिः सप्त दुदुहान आशिरꣳ सोमो हृदे पवते चारु मत्सरः ॥

अयम् । पुनानः । उषसः । अरोचयत् । अयम् । सिन्धुभ्यः । अभवत् । उ । लोककृत् । लोक । कृत् । अयम् । त्रिः । सप्त । दुदुहानः । आशिरम् । आ । शिरम् । सोमः । हृदे । पवते । चारु । मत्सरः ॥८२३॥

Samveda - Mantra Number : 823
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 5;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(अयम्) = यह सिकता निवावरी उषस:- बहुत सवेरे से ही पुनान:- अपने जीवन को पवित्र करता हुआ अरोचयत्=अपने सब कोशों को उज्ज्वल व दीप्त करता है। सब कोशों का स्वास्थ्य नैर्मल्य पर ही निर्भर करता है । शरीर में मल [Foreign matter] बढ़ते ही मनुष्य रोगी हो जाता है। इन्द्रियों का मल विषयपंक है-मन का राग-द्वेष तथा बुद्धि की कुण्ठता और अन्त में आनन्दमय कोश का मल असहिष्णुता है । यह प्रातः से ही इन मलों के शोधन में लगता है और अपने समूचे जीवन को दीप्त बनाता है। २. उ- और अयम् - यह सिकता निवावरी सिन्धुभ्यः-स्यन्दन के स्वभाववाले रेत:कणों से [आप: रेतः भूत्वा] अपने जीवन में लोककृत्= [लोक् दर्शने] प्रभु का दर्शन करनेवाला अभवत्-बनता है । वस्तुतः सुरक्षित सोम [रेतस्] ने ही हमें उस सोम [प्रभु] का दर्शन कराना है। 'यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति' प्रभु-दर्शन के लिए यह ब्रह्मचर्य आवश्यक ही है। ३. अयम्=यह त्रिसप्त=१० इन्द्रियाँ १० प्राण व एक मन इन इक्कीस साधनों को दुदुहान:- [दुह प्रपूरणे] न्यूनताओं को दूर करके शक्ति से भरता हुआ ४. सोमः = यह शक्ति का पुञ्ज तथा सौम्य स्वभाववाला हृदे=हृदय में [हृदि] उस चारु आशिरम् - सुन्दर आश्रयभूत प्रभु को [श्रिञ् सेवायाम् से आशिर] पवते - प्राप्त होता और मत्सर:=आनन्दमय जीवनवाला होता है । 
Essence
हम प्रातः से ही अपना परिमार्जन प्रारम्भ करें तभी हृदयस्थ प्रभु का हम दर्शन कर पाएँगे।
Subject
चार प्रयत्न