Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 819

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- नहुषो मानवः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
स꣡मु꣢ प्रि꣣या꣡ अ꣢नूषत꣣ गा꣢वो꣣ म꣡दा꣢य꣣ घृ꣡ष्व꣢यः । सो꣡मा꣢सः कृण्वते प꣣थः꣡ पव꣢꣯मानास꣣ इ꣡न्द꣢वः ॥८१९॥

सम् । उ꣣ । प्रियाः꣢ । अ꣣नूषत । गा꣡वः꣢꣯ । म꣡दा꣢꣯य । घृ꣡ष्व꣢꣯यः । सो꣡मा꣢꣯सः । कृ꣣ण्वते । पथः꣢ । प꣡व꣢꣯मानासः । इ꣡न्द꣢꣯वः ॥८१९॥

Mantra without Swara
समु प्रिया अनूषत गावो मदाय घृष्वयः । सोमासः कृण्वते पथः पवमानास इन्दवः ॥

सम् । उ । प्रियाः । अनूषत । गावः । मदाय । घृष्वयः । सोमासः । कृण्वते । पथः । पवमानासः । इन्दवः ॥८१९॥

Samveda - Mantra Number : 819
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 5;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
वह व्यक्ति जो अपने को प्रभु से जोड़ता है और परिणामत: मानवमात्र से अपने को एक करना चाहता है वह 'नहुषः मानवः ' है – यह सभी के हित में अपना हित समझता है । ये व्यक्ति ही १. (उ) = निश्चय से प्रभु को (प्रियाः) = प्रिय होते हैं २. (समनूषत) = ये सदा प्रभु का स्तवन करते हैं ३. (गाव: मदाय) = वेदवाणियाँ इनको हर्ष देनेवाली होती हैं, अर्थात् ज्ञान प्राप्ति में ही ये आनन्द लेते हैं। ४. (घृष्वयः) = [घृषु संघर्षे] ये अध्यात्मसंग्राम में कामादि वासनाओं का धर्षण कर डालते हैं । ५. (सोमासः) = सौम्य स्वभाव के होते हैं ६. (कृण्वते पथ:) = औरों के लिए भी ये मार्गदर्शक होते हैं— रास्ता बना देते हैं। ७. (पवमानासः) = ये सदा अपने जीवन को पवित्र बनाने में लगे रहते हैं ८. (इन्दवः) = शक्तिशाली होते हैं।

१. और ८. प्रभु के प्रिय वे ही हैं जो शक्तिशाली हैं

२. और ७. प्रभु का स्तवन अपने को पवित्र करने का उपाय है।  

३. और ६. ज्ञानी ही औरों के लिए मार्गदर्शक हो सकता है। अन्यथा तो ('अन्धेनैव नीयमानाः यथान्धाः') वाली बात होती है ।

४. और ५. वासनाओं का पूर्ण विजय करके ही मनुष्य सौम्य बनता है । वस्तुतः वासनाविजय की चरम सीमा सौम्यता ही है। प्रस्तुत मन्त्र 'चित्रबन्ध काव्य' का एक सुन्दर उदाहरण है |
Essence
हमारा जीवन भी 'नहुष मानव' का जीवन हो । हम प्रभु के प्रिय बनें – शक्तिशाली हों । सूचना–यहाँ यह बात विशेष ध्यान देने योग्य है कि प्रारम्भ और अन्त को मिलाकर भावना यह है कि प्रभु को वे ही प्रिय होते हैं जो शक्तिशाली बनते हैं ।
Subject
'नहुष मानव' का जीवन 'चित्रबन्ध काव्य "