Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 817

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- अहमीयुराङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
स꣡म्मि꣢श्लो अरु꣣षो꣡ भु꣢वः सूप꣣स्था꣡भि꣣र्न꣢ धे꣣नु꣡भिः꣢ । सी꣡द꣢ञ्छ्ये꣣नो꣢꣫ न यो꣣निमा꣢ ॥८१७॥

सं꣡मि꣢꣯श्लः । सम् । मि꣣श्लः । अरुषः꣢ । भु꣣वः । सूपस्था꣡भिः꣢ । सु꣣ । उपस्था꣡भिः꣢ । न । धे꣣नु꣡भिः꣢ । सी꣡द꣢꣯न् । श्ये꣣नः꣢ । न । यो꣡नि꣢꣯म् । आ ॥८१७॥

Mantra without Swara
सम्मिश्लो अरुषो भुवः सूपस्थाभिर्न धेनुभिः । सीदञ्छ्येनो न योनिमा ॥

संमिश्लः । सम् । मिश्लः । अरुषः । भुवः । सूपस्थाभिः । सु । उपस्थाभिः । न । धेनुभिः । सीदन् । श्येनः । न । योनिम् । आ ॥८१७॥

Samveda - Mantra Number : 817
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 5;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (सूपस्थाभिः) = उत्तमता व सुगमता से उपस्थान के योग्य (धेनुभिः न) = गौओं के समान इन वेदवाणियों से तू (संमिश्लः भुवः) = युक्त हो । ये वेदवाणियाँ कठिन नहीं- ये सूपस्थ हैं, सुगमता से उपस्थान के योग्य हैं। जैसे एक उत्तम धेनु सुदोह्य होती है उसी प्रकार ये वाणियाँ भी सुदोह्य हैं— सुगमता से समझने योग्य हैं। तू इनके पास बैठ तो ? २. इन वेदवाणियों की उपासना से तू (अरुषः) = आरोचन: [नि० ३.७ अरुषं रूप] उत्तम रूपवाला हो । ३. (श्येनः न) = शंसनीय गतिवाला-सा बनकर तू ४. (योनिम् आसीदन्) = मूल हृदयदेश में स्थित होनेवाला हो, अर्थात् तू सारे ध्यान को केन्द्रित कर हृदय में प्रभु की उपासना करनेवाला बन । 'योनि' शब्द का अर्थ ‘वेदि' भी है। तू वेदि में स्थित हो, यज्ञादि उत्तम कर्मों को करनेवाला बन ।
Essence
हम वेदाध्ययन करें, क्रोधशून्य उत्तम रूपवाले हों, शंसनीय गतिवाले हों, हृदय में प्रभु की उपासना करें अथवा वेदियों में स्थित हो यज्ञ करनेवाले बनें ।
Subject
अमहीयु को प्रभु का उपदेश